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राजस्थानी भाषा जित्ती मीठी, बित्ती ई संस्कारी। संस्कारां री छिब पग-पग माथै। खावण-पीवण, पैरण-ओढण, उठण-बैठण में संस्कार। बोलण-बतळावणं में संस्कार। सबदां रा संस्कार सिरै। कैबा कै बाण रा घाव मिटै, पण बोली रा घाव नीं मिटै। इण सारू सावचेती सूं बोलणो। बोलण सारू बगत-घड़ी, वेळा-कुवेळा अर ठोड़-ठिकाणों देखणो। ऊंच-नीच अर काण-कायदो देखणो। बो' ई सबद बपरावणो, जकै री दरकार। मांदो नीं बोलणो। नन्नो नीं बरतणो। यानी ...नकार नीं बरतणो। बडेरा सिखावै कै नीवड़णो, बंद करणो, कमती होवणो, बुझावणो, आग लगावणो जेड़ा सबद नीं बोलणा। नीं, कोनी अर खूटणो मूंडै सूं नीं काढणो।


भौम बिहूणा भौमियां,

कार नहीं बेकार |

भूख भूपाला भटकता,

रोजी बिन रुजगार ||१


जमीं गई जमीयत गई,

ठौड़ ठाकरी ठाण |

ठिकाणां ठिकाणे लगा,

रजवाडी मौखाण ||२


आन्दोलन आकर अड्या,

पकड्या पांच हजार |

जैपर अलवर जोधपुर,

दिया जेल में डार ||३


रापट रोळी राज में,

पूछ न दाद पुकार |

ठौड़ ठौड़ थाणां थरप,

सुणण लागा जैकार ||४


रुल सभा जागीर बिल,

पेस हुवो जिण ठाण |

दस सत्याग्रही बिल समै,

कपि जिम लिवि कूदांण ||५



हाक वाक् होगी हवा,

सट पटाय मिम्बराण |

लंक गढ़ी कपिराण जिम,

थर थर लागा कम्पाण ||६


सीट छोड़ न्हाटा सदसे,

चैयर टेबलां हेट |

सत्याग्रही स्व सेवकां,

झेल सक्या नी फेंट ||७


कथित सैनानी सुतंत्र्ता,

जंग आजादी जोद |

मिटा मरदसी मांडणा,

मांडाणी मन मोद ||8


जब्ती बिल जागीर रो,

विधान सभा में पेस |

दस सिर वाली लंक जिम,

कूद पड्या कपि भेस ||९


कमर बाँध भेलो हुवौ,

सगलो क्षत्र समाज |

गति छछूंदर नागसी,

दुविधा विकट दराज ||१०


कुरुखेत पारथ जिसी,

बणी स्थिति आंण |

मोह छोह बांधव सगां,

करतव लियो पिछांण ||११


श्रीनाथ क्रपा करी,

करतब ग्यान करांण |

सत मत पथ राखे मती,

भय नह मन में आंण ||१२


छबि बिगाड़न छिपकला,

चमचा चाटुकार |

मुलक कुटिल दिल मानवां,

दूर रखै सुभकार ||१३


सात दिवस चिंतण सिविर,

सारणेस सिव थांन |

आन्दोलन रचना रची,

सगळी रो मो भान ||१४


आन्दोलन प्रभाव फल,

हणू सवाई देव |

सरविस सरकारी लगा,

जाणू सारो भेव ||१५


दांतै हुडील जावली,

बाढ़मेर निम्बहेर |

राजपुरै हरजी मुणा,

साथ सवाई फेर ||१६


आँदोलण चौपासणी,

भू-स्वामी सह बात |

भगतपुरै सौभागसी,

सारी विध रिय साथ ||१७


मुरब्बा बावीस संघनै,

समझौते सरकार |

दियै जिकण रै कारणे,

संघरी व्ही दो फार ||१८


खिंदासर उम्मीदसिं,

पूंख नेवरी बाग़ |

जाणे सारा रहसनै,

भगतपुरै सौभाग ||१९


कारण जो महामहिमकथै,

आन्दोलन आधार |

असैम्बली री मिनिट्स में,

बांच करै निरधार ||२०


विजेंद्र शेखावत


सिंहासन


एक स्त्री की मान रक्षा के लिए शेखाजी ने झुन्थर के कोलराज गौड़ का सर काट कर अपने अमरसर के गढ़ के सदर द्वार पर टंगवा दिया,ऐसा करने का उनका उद्देश्य उदंड व आततायी लोगों में भय पैदा करना था हालांकि यह कृत्य वीर धर्म के खिलाफ था शेखा जी के उक्त कार्य की गौड़ा वाटी में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई और गौड़ राजपूतों ने इसे अपना जातीय अपमान समझा,अनेक गौड़ योद्धाओ ने अपने सरदार का कटा सर लाने का साहसिक प्रयत्न किया लेकिन वे सफल नही हुए और गौंडो व शेखाजी के बीच इसी बात पर ५ साल तक खूनी संघर्ष चलता रहा आख़िर जातीय अपमान से क्षुब्ध गौड़ राजपूतों ने अपनी समस्त शक्ति इक्कट्ठी कर घाटवा नामक स्थान पर युद्ध के लिए राव शेखा जी को सीधे शब्दों में रण निमंत्रण भेजा

गौड़ बुलावे घाटवे,चढ़ आवो शेखा |

लस्कर थारा मारणा,देखण का अभलेखा ||

रण निमंत्रण पाकर शेखा जी जेसा वीर चुप केसे रह सकता था और बिखरी सेना को एकत्रित करने की प्रतीक्षा किए बिना ही शेखा जी अपनी थोडी सी सेना के साथ घाटवा पर चढाई के लिए चल दिए और जीणमाता के ओरण में अपने युद्ध सञ्चालन का केन्द्र बना घाटवा की और बढे ,घाटवा सेव कुछ दूर खुटिया तालाब (खोरंडी के पास )शेखा जी का गौडों से सामना हुवा ,मारोठ के राव रिडमल जी ने गौडों का नेत्रत्व करते हुए शेखा जी पर तीरों की वर्षा कर भयंकर युद्ध किया उनके तीन घटक तीर राव शेखा जी के लगे व शेखा जी के हाथों उनका घोड़ा मारा गया ,इस युद्ध में शेखा जी के ज्येष्ठ पुत्र दुर्गा जी कोलराज के पुत्र मूलराज गौड़ के हाथों मारे गए और इसके तुंरत बाद मूलराज शेखा जी के एक ही प्रहार से मारा गया | घोड़ा बदल कर रिडमल जी पुनः राव शेखा जी के समक्ष युद्ध के लिए खड़े हो गए ,गौड़ वीरों में जोश की कोई कमी नही थी लेकिन उनके नामी सरदारों व वीरों के मारे जाने से सूर्यास्त से पहले ही उनके पैर उखड़ गए और वे घाटवा के तरफ भागे जो उनकी रणनीति का हिस्सा था वे घाटवा में मोर्चा बाँध कर लड़ना चाहते थे ,लेकिन उनसे पहले शेखा जी पुत्र पूरण जी कुछ सैनिकों के साथ घाटवा पर कब्जा कर चुके थे |

खुटिया तालाब के युद्ध से भाग कर घाटवा में मोर्चा लेने वाले गौडों ने जब घाटवा के पास पहुँच कर घाटवा से धुंवा उठता देखा तो उनके हौसले पस्त हो गए और वे घाटवा के दक्षिण में स्थित पहाडों में भाग कर छिप गए शेखा जी के पुत्र पूरण जी घाटवा में हुए युद्ध के दौरान अधिक घायल होने के कारण वीर गति को प्राप्त हो गए | घायल शेखा जी ने शत्रु से घिरे पहाडों के बीच रात्रि विश्राम लेना बुधिसम्मत नही समझ अपने जीणमाता के ओरण में स्तिथ सैनिक शिविर में लोट आए इसी समय उनके छोटे पुत्र रायमल जी भी नए सेन्यबल के साथ जीणमाता स्थित सेन्य शिविर में पहुँच चुके थे ,गौड़ शेखा जी की थकी सेना पर रात्रि आक्रमण के बारे में सोच रहे थे लेकिन नए सेन्य बल के साथ रायमल जी पहुँचने की खबर के बाद वे हमला करने का साहस नही जुटा सके |

युद्ध में लगे घावों से घायल शेखा जी को अपनी मर्त्यु का आभास हो चुका था सो अपने छोटे पुत्र रायमल जी को अपनी ढाल व तलवार सोंप कर उन्होंने अपने उपस्थित राजपूत व पठान सरदारों के सामने रायमल जी को अपना उतराधिकारी घोषित कर अपनी कमर खोली ,और उसी क्षण घावों से क्षत विक्षत उस सिंह पुरूष ने नर देह त्याग वीरों के धाम स्वर्गलोक को प्रयाण किया ,जीणमाता के पास रलावता गावं से दक्षिण में आधा मील दूर उनका दाह संस्कार किया गया जहाँ उनके स्मारक के रूप में खड़ी छतरी उनकी गर्वीली कहानी की याद दिलाती है |

घाटवा का युद्ध सं.१५४५ बैशाख शुक्ला त्रतीय के दिन लड़ा गया था और उसी दिन विजय के बाद शेखा जी वीर गति को प्राप्त हुए | शेखा जी की म्रत्यु का संयुक्त कछवाह शक्ति द्वारा बदला लेने के डर से मारोठ के राव रिडमल जी गोड़ ने रायमल जी के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर और 51 गावं झुन्थर सहित रायमल जी को देकर पिछले पॉँच साल से हो रहे खुनी संघर्ष को रिश्तेदारी में बदल कर विवाद समाप्त किया |

संदर्भ - राव शेखा,शेखावाटी प्रदेश का राजनैतिक इतिहास
मुझे गर्व है की में ऐसे राव शेखा जी का वंशज हूँ

विजेंद्र शेखावत
सिंहासन


जीवन के आखिरी लम्हों को समेटता एक मानव
आज के युवा मानव का हास्य पात्र बन गया
कल वो उस युवा की जगह था मगर आज वो
युवा उसकी "उस" जगह ... ये कैसा जीवन ?
जिस बचपन को वो अपनी लाठी समझ बैठा
वो उसकी लाठी चुराने को खेल समझ बैठा .. ये कैसा खेल ?
बचपन और युवा के बीच में फंसा आज का बुजर्ग
बाज के पंजे में फसां एक पक्षी सा निरीह... ये कैसा दौर ?
ए युवा ! बुजर्ग से जीवन का अनुभव सीख
उसका तजुर्बा तेरे जीवन को जीवन बना देगा ..
नहीं तो कल......
तू उसकी जगह ..
और ये बचपन...
तेरी जगह लेगा ...
और तब...
एक और जीवन चक्र ...
एक इंसान को इंसान बन ने महरूम कर देगा ...


विजेंद्र शेखावत
सिंहासन





टीको टमको दायजो !
बड़ियो घर घर आज !
फेल्यो सारे देश में !
दुखी फिरे समाज !

भेंस बिके पाडी बिके !
बिके जमीन जायदाद !
बेटा बेच बेच मोल ले !
आँ बापा लखदाद !

टुटयो आभो धरती घसगी !
कड़क बिजली घर में पड़गी !
बिगड्यो जापो पत्थर ल्याई !
करम फुट गया बेटी जाई !

सासु हाथ लगाया काना !
बड़ी जेठानी देवे ताना !
भुवा ननद ड्योढ़ी बोले !
हँसे देवरानी लुक लुक ओले !

सुसरो सुनी गाज सी पड़गी !
पूरा घर में सांस सी निकड गी !
उलटी रीत समाज री, करनी इणरी खोज !
बेटो जल्म्याँ हरख क्यूँ , क्यों बेटी ज्ल्म्याँ सोच !


दारु एक दवाई है करती चोखो काज !
आज भर भर बोतल पिवन बेठ्यो समाज !
ई दारू में रजवाड़ा गया और गया राजाओ का राज !
अब भी सुधर जाओ थे मत होवो बर्बाद !
गहनों बिक गयो गांठो बिक्ग्यो बिकगी जमी जायदाद !
एक रिपिया री पैदा कोनी क्यूँ हो रया बर्बाद !


घरां पेली पावना आता बान चाय पानी री मनवार कराता !
अब मेहमाना न बोतल प्याओ !
नहीं मिले तो दो चार थैली ल्याओ !
नहीं मिली तो इज्जत जावे !
खाली रोटी घालता शर्म सी आवे !
पाड़ोसी के फोजी आयो दो चार बोतल जरुर ल्याओ !
कह लुगाई बेगा ल्याओ पावना न तो कीया जिया ही पाओ !


    • सूका सूका खेतडा पण नैणा मै बाढ ।


      घर मँ कोनी बाजरी ऊपर सूँ दो साढ ॥


      जद सूँ पाकी बाजरी काचर मोठ समेत ।


      दिन भर नापै चाव सूँ पटवारी जी खेत ॥


      फिर फिर आवै बादळी घिर घिर आवै मेह ।


      सर सर करती पून मँ थर थर कांपै देह ॥


      होगी सोळा साल री बेटी करै बणाव ।


      कद निपजैली टीबडी कद मांडूला ब्याव ॥


      टूटी फूटी झूँपडी बरसै गरजै गाज ।


      इण चौमासै रामजी दोराँ रहसी लाज ॥


      टाबर टीकर मोकळाँ करजै री भरमार ।


      राम रूखाळी राखजै थाँ सरणै घरबार ॥


      निरधनियाँ नै धन मिल्यो रोजणख्याँ नै राग ।


      राम बता कद जागसी परदेसी रा भाग ॥


      उगतो पिणघट ऊपराँ सुणतो मिठी बात ।


      गळी गुवाडी घूमतो चान्दो सारी रात ॥


      ना पिणघट ना बावडी ना कोयल ना छाँव ।


      तो भी चोखो सहर सूँ म्हारो आधो गांव ॥


      सांझ ढळ्याँ नित जांवता देखै सारो गांव ।


      पिरमा थारी लाडली पटवारी रै ठांव ॥


      पैली उठती गौरडी पाछै उठती भोर ।


      झांझर कै ही नीरती सगळा डांगर ढोर ॥


      छैल सहर सूँ बावडै खरचै धोबा धोब ।


      पडै गांव मै रात दिन पटवारी सा रोब ॥


      जद मन तरस्यो गांव नै जद जद हुयो अधीर ।


      दूहा रै मिस मांडदी परदेसी री पीर ॥


      प्रीत आपरी अचपळी घणी करै कुचमाद ।


      सुपना मै सामी रवै जाग्या आवै याद ॥


      पाती लिख रियो गांव नै अपरंच ओ समचार ।


      दुख पावुँ परदेस मँ जीवूँ हूँ मन मार ॥


      राग रंग नी आवडै कींकर उपजै तान ।


      घर मै कोनी बाजरी अर टूट्योडी छान ॥


      घर दे घर रूजगार दे घर घर री दे साख ।


      ना देवै तो सांवरा जीवण पाछो राख ॥


      बिन हरियाळी रूंखडा घरघूल्या सा ठांव ।


      ’राही’ दीखै दूर सूँ थारो आधो गांव ॥


      लेग्या तो हा गांव सूँ कंचन देही राज ।


      पाछी ल्याया सहर सूँ खांसी कब्जी खाज ॥


      गाय चराती छोरडयाँ जोबन सूँ अणजाण ।


      देख ओपरा जा लूकै कर जांटी री आण ।।


      जोध जुवानी बेलड्याँ मिलसी करयाँ बणाव ।


      आखडजै मत पावणा पगडंड्या रै गांव ॥


      के तडपासी बादळी के कोयल री कूक ।


      पैली ही सूँ काळजो हुयो पड्यो दो टूक ॥


      अजब पीर परदेस री म मर जीवै जीव ।


      घर मै तरसै गोरडी परदेसाँ मै पीव ।।


      ना आंचळ ना घूंघटो ना हीवडै मै लाज ।


      घिरसत पाळै गोरडी रोटी पोवै राज ॥


      घाटै रो घर दे दिये दुख दीजै अणचींत ।


      मतना दीजे सांवरा परदेसी री प्रीत ॥


      धान महाजन रै घराँ ढोर बिक्या बे दाम ।


      करज पुराणो बाप रो कीयाँ चुकै राम ॥


      बेटो तो परदेस मै घर बूढा मा बाप ।


      दोनो पीढी दो जघाँ दुख भोगै चुपचाप ॥


      ठाला बिन रूजगार कै ताना देता लोग ।


      भरी न अब तक गांव सूँ मनस्या बळण जोग ॥


      जद जासी परदेस तूँ हुसी जद बरबाद ।


      दरद दिसावर ई कडया रोज करैलो याद ॥


      कितरा ही दुहा लिखूँ अकथ रहीज्या भाव ।


      परदेसी रो दरद तो है गूंगै रो भाव ॥


      विजेंद्र शेखावत
      सिंहासन