एक सैनिक जो कम उम्र में शहीद हो गया.. और मरते वक़्त उसने अपनी माँ को क्या खत लिखा होगा....!! सीमा पे एक जवान जो शहीद होगया, संवेदनाओं के कितने बीज बो गया, तिरंगे में लिपटी लाश उसकी घर पे आ गयी, सिहर उठी हवाएँ, उदासी छा गयी, तिरंगे में रखा खत जो उसकी माँ को दिख गया, मरता हुआ जवान उस खत में लिख गया, बलिदान को अब आसुओं से धोना नहीं है, तुझको कसम है माँ मेरी की रोना नहीं है। मुझको याद आ रहा है तेरा उंगली पकड़ना, कंधे पे बिठाना मुझे बाहों में जकड़ना, पगडंडियों की खेतों पे मैं तेज़ भागता, सुनने को कहानी तेरी रातों को जागता, पर बिन सुने कहानी तेरा लाल सो गया, सोचा था तूने और कुछ और हो गया, मुझसा न कोई घर में तेरे खिलौना नहीं है, तुझको कसम है माँ मेरी की रोना नहीं है। सोचा था तूने अपने लिए बहू लाएगी, पोते को अपने हाथ से झूला झुलाएगी, तुतलाती बोली पोते की सुन न सकी माँ, आँचल में अपने कलियाँ तू चुन न सकी माँ, न रंगोली बनी घर में न घोड़े पे मैं चढ़ा, पतंग पे सवर हो यमलोक मैं चल पड़ा, वहाँ माँ तेरे आँचल का तो बिछौना नहीं है, तुझको कसम है माँ मेरी की रोना नहीं है। बहना से कहना राखी पे याद नकरे, किस्मत को न कोसे कोई फरियाद न करे, अब कौन उसे चोटी पकड़ कर चिढ़ाएगा, कौन भाई दूज का निवाला खाएगा, कहना के भाई बन कर अबकी बारआऊँगा, सुहाग वाली चुनरी अबकी बार लाऊँगा, अब भाई और बहना में मेल होना नहीं है, तुझको कसम है माँ मेरी की रोना नहीं है। सरकार मेरे नाम से कई फ़ंड लाएगी, चौराहों पे तुझको तमाशा बनाएगी, अस्पताल स्कूलों के नाम रखेगी, अनमोल शहादत का कुछ दाम रखेगी, पर दलाओं की इस दलाली पर तूथूक देना माँ, बेटे की मौत की कोई कीमत न लेना माँ, भूखे भले मखमल पे हमको सोना नहीं है, तुझको कसम है माँ मेरी की रोना नहीं है।
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लोग कहते की नारी हमारा गर्व होती है,क्या यह सच है,फिर क्यों वो हर रोज घरो मे जलाई जाती है,
लोग कहते है की नारी माँ बहन,बीवी,दोस्त हर रूप मे हमारा ख्याल रखती है,क्या यह सच है,फिर क्यों वो अपनी अस्मत बचाने को घरो मई छिपाई जाती है,
लोग कहते है की नारी देवी का स्वरूप होती है,क्या यह सच है,फिर क्यों उसका अपमान घर घर मे किया जाता है,
लोग कहते है नारी जीवन की खुशियों की सौगात होती है,क्या यह सच है,फिर क्यों उसकी आंखे हर पल मे रोती है,
कहने को तोह भारत को माँ का दर्जा दिया है,क्या यह सच है,फिर क्यों यहाँ हर रोज कत्ले आम कराये जाते है,
सच कहने को सब सच हैऔर मानो तोह सब झूठ क्योकि लोगो ने भारत मे न जाने कितनी मान्यताये रखी हैपर सब झूठ क्योकि उनके आगे एक औरत का जीवन डूब कर रह जाता हैतो कभी सोचा है क्या आपने वो सब कुछ समझ कर कुछ नहीं समझी जाती हैक्या आपने कभी अपनी तरह उसे सम्मान दिया है चाहे वो ओई भी औरत होया आप भी उन्ही मे से है जो नारी का सम्मान करना नहीं जानतेक्या यह सच है?
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अपनी सनातन संस्कृति के अभिन्न अंग
दो पक्ष - कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष।
तीन ऋण - देव ऋण, पित्र ऋण एवं ऋषि त्रण ।
चार युग - सतयुग , त्रेता युग , द्वापरयुग एवं कलयुग।
चार धाम - द्वारिका , बद्रीनाथ, जगन्नाथ पूरी एवं रामेश्वरम धाम।
चारपीठ - शारदा पीठ ( द्वारिका ), ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम), गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) एवं श्रन्गेरिपीठ !
चार वेद- ऋग्वेद , अथर्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद ।
चार आश्रम - ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , बानप्रस्थ एवं संन्यास !
चार अंतःकरण - मन , बुद्धि , चित्त , एवं अहंकार !
पञ्च गव्य - गाय का घी , दूध , दही , गोमूत्र एवं गोबर , !
पञ्च देव - गणेश , विष्णु , शिव , देवी और सूर्य !
पंच तत्त्व - प्रथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश !
छह दर्शन - वैशेषिक , न्याय , सांख्य, योग , पूर्व मिसांसा एवं दक्षिण मिसांसा !
सप्त ऋषि - विश्वामित्र , जमदाग्नि , भरद्वाज , गौतम , अत्री , वशिष्ठ और कश्यप !
सप्त पूरी - अयोध्या पूरी , मथुरा पूरी , माया पूरी ( हरिद्वार ) , कशी , कांची ( शिन कांची - विष्णु कांची ) , अवंतिका और द्वारिका पूरी !
आठ योग - यम , नियम, आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान एवं समाधी !
आठ लक्ष्मी - आग्घ, विद्या, सौभाग्य, अमृत, काम, सत्य, भोग, एवं योग लक्ष्मी !
नव दुर्गा - शैल पुत्री , ब्रह्मचारिणी , चंद्रघंटा , कुष्मांडा , स्कंदमाता , कात्यायिनी , कालरात्रि , महागौरी एवं सिद्धिदात्री !
दस दिशाएं - पूर्व , पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, इशान, नेत्रत्य, वायव्य आग्नेय ,आकाश एवं पाताल !
मुख्या ग्यारह अवतार - मत्स्य , कच्छप , बराह , नरसिंह , बामन , परशुराम , श्री राम , कृष्ण , बलराम , बुद्ध , एवं कल्कि !
बारह मास - चेत्र , वैशाख , ज्येष्ठ ,अषाड़ , श्रावन , भाद्रपद , अश्विन , कार्तिक , मार्गशीर्ष . पौष , माघ , फागुन !
बारह राशी - मेष , ब्रषभ , मिथुन , कर्क , सिंह , तुला , ब्रश्चिक , धनु , मकर , कुम्भ , एवं कन्या !
बारह ज्योतिर्लिंग - सोमनाथ, मल्लिकर्जुना, महाकाल, ओमकालेश्वर , बैजनाथ , रामेश्वरम , विश्वनाथ , त्रियम्वाकेश्वर , केदारनाथ , घुष्नेश्वर, भीमाशंकर एवं नागेश्वर।
पंद्रह तिथियाँ - प्रतिपदा, द्वतीय, तृतीय, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा, अमावश्या।
स्म्रतियां - मनु, विष्णु, अत्री, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगीरा, यम, आपस्तम्ब, सर्वत, कात्यायन, ब्रहस्पति, पराशर, व्यास, शांख्य, लिखित, दक्ष, शातातप, वशिष्ठ।
दो पक्ष - कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष।
तीन ऋण - देव ऋण, पित्र ऋण एवं ऋषि त्रण ।
चार युग - सतयुग , त्रेता युग , द्वापरयुग एवं कलयुग।
चार धाम - द्वारिका , बद्रीनाथ, जगन्नाथ पूरी एवं रामेश्वरम धाम।
चारपीठ - शारदा पीठ ( द्वारिका ), ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम), गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) एवं श्रन्गेरिपीठ !
चार वेद- ऋग्वेद , अथर्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद ।
चार आश्रम - ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , बानप्रस्थ एवं संन्यास !
चार अंतःकरण - मन , बुद्धि , चित्त , एवं अहंकार !
पञ्च गव्य - गाय का घी , दूध , दही , गोमूत्र एवं गोबर , !
पञ्च देव - गणेश , विष्णु , शिव , देवी और सूर्य !
पंच तत्त्व - प्रथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश !
छह दर्शन - वैशेषिक , न्याय , सांख्य, योग , पूर्व मिसांसा एवं दक्षिण मिसांसा !
सप्त ऋषि - विश्वामित्र , जमदाग्नि , भरद्वाज , गौतम , अत्री , वशिष्ठ और कश्यप !
सप्त पूरी - अयोध्या पूरी , मथुरा पूरी , माया पूरी ( हरिद्वार ) , कशी , कांची ( शिन कांची - विष्णु कांची ) , अवंतिका और द्वारिका पूरी !
आठ योग - यम , नियम, आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान एवं समाधी !
आठ लक्ष्मी - आग्घ, विद्या, सौभाग्य, अमृत, काम, सत्य, भोग, एवं योग लक्ष्मी !
नव दुर्गा - शैल पुत्री , ब्रह्मचारिणी , चंद्रघंटा , कुष्मांडा , स्कंदमाता , कात्यायिनी , कालरात्रि , महागौरी एवं सिद्धिदात्री !
दस दिशाएं - पूर्व , पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, इशान, नेत्रत्य, वायव्य आग्नेय ,आकाश एवं पाताल !
मुख्या ग्यारह अवतार - मत्स्य , कच्छप , बराह , नरसिंह , बामन , परशुराम , श्री राम , कृष्ण , बलराम , बुद्ध , एवं कल्कि !
बारह मास - चेत्र , वैशाख , ज्येष्ठ ,अषाड़ , श्रावन , भाद्रपद , अश्विन , कार्तिक , मार्गशीर्ष . पौष , माघ , फागुन !
बारह राशी - मेष , ब्रषभ , मिथुन , कर्क , सिंह , तुला , ब्रश्चिक , धनु , मकर , कुम्भ , एवं कन्या !
बारह ज्योतिर्लिंग - सोमनाथ, मल्लिकर्जुना, महाकाल, ओमकालेश्वर , बैजनाथ , रामेश्वरम , विश्वनाथ , त्रियम्वाकेश्वर , केदारनाथ , घुष्नेश्वर, भीमाशंकर एवं नागेश्वर।
पंद्रह तिथियाँ - प्रतिपदा, द्वतीय, तृतीय, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा, अमावश्या।
स्म्रतियां - मनु, विष्णु, अत्री, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगीरा, यम, आपस्तम्ब, सर्वत, कात्यायन, ब्रहस्पति, पराशर, व्यास, शांख्य, लिखित, दक्ष, शातातप, वशिष्ठ।
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महिलाओ का भी अधिकार है विधवा पुनर्विवाह.........लेखन -प्रद्युम्न सिंह चौहान अगर कोई महिला शादी के कुछ दिन बाद दुर्भाग्य से विधवा हो जाती है तो क्या किया जाना चाहिए ?..शायद आप यही सोच रहे होंगे कि उसका पुनर्विवाह कर दिया जाना चाहिए यदि वह खुद चाहती है कि उसका पुनर्विवाह किया जाये ।यह बात भले ही सही लगे कि पुनर्विवाह कर दिया जाना चाहिए लेकिन सामाजिक रूप से यदि इसे राजपूत समाज के सन्दर्भ में देखा जाये तो यहाँ पर ये नहीं हो सकता है क्योकि राजपूत समाज में विधवा पुनर्विवाह नहीं होता है ।जब बात हम कुरूतियो और समस्याओ की करते है तो राजपूत समाज में एक और समस्या है या कहे कुरूति है "विधवा पुनर्विवाह "|मै आज बहुत ही संवेदन शील मुद्दे पर बात कर रहा हु ,दुर्भाग्य वश किसी महिला के पति की मृत्यु हो जाने पर राजपूतो में महिलाओ का पुनर्विवाह नहीं होता है |किसी महिला के भी अपने परिवार को लेकर सपने होते है यदि दुर्भाग्य से उसके पति की मृत्यु विवाह के कुछ दिन बाद ,कुछ महीने बाद हो जाती है ,अर्थात महिला को अपने दाम्पत्य का सुख नहीं मिल पाया ,उसके हर्दय में भी ममता है वो भी चाहती है की उसका परिवार रहे ,उसकी संतान रहे वो अपनी ममता उस संतान पर लुटा सके और भी उसकी अपनी भावनाए होती है लेकिन वो महिला गलत प्रथा ,एक कुरूति जिसके अनुसार वह पुनर्विवाह नहीं कर सकती है ।इस कुरीति के कारण उस महिला की भावनाओ की हत्या की जाती है ,उसका संतान को जन्म देने का और उस पर अपनी ममता को अर्पित करने का सपना अधुरा रह जाता है भले ही उस महिला कि आत्मा कहे कि विवाह कर लेकिन इस सामाजिक कुरूति और गलत सोच के कारण वो अपनी भावनाए समाज में ,परिवार में व्यक्त नही कर पाती है ।हम इसे एक वैज्ञानिक और दार्शनिक नजरिये से देखे तो यह उस महिला के साथ बड़ा अन्याय है क्योकि क्या महिला होना उसकी गलती है ?......जो की नहीं है लेकिन समाज ने जो कुरूति बनाई है वो जरुर गलत है।इस कुरूति के कारण हमारी मातृ शक्तियों का जीवन दुखो से भर दिया गया ,कितनी ही महिलाओ की कोख खाली रह गई होगी ,कितनी ही महिलाओ ने जीवित रहते हुए मृत्यु का अनुभव किया होगा ,समाज के लोगो ने मानसिक प्रताड़ना दी होगी वो अलग ।वैसे भी हम सिर्फ दुखो का आकलन कर सकते है लेकिन दुखो का अनुभव उसे ही होता है जिस पर बीतती है ।पुरुष प्रधान समाज का ये एक बड़ा सच है जिसमे सिर्फ पुरुषो का ये विचार की वो किसी विधवा से विवाह नहीं करेंगे लेकिन यदि किसी महिला की मृत्यु हो जाये तो पुरुष कर सकता है विवाह ।यह एक तरह से महिला और पुरुष में पक्ष पात है ,या कहे एक का सम्मान और दुसरे का अपमान । लेकिन मै यह कहूँगा "यदि महिला चाहे तो उसका पुनर्विवाह किया जाना चाहिए " आपको और समाज के लोगो को ऐसा लगेगा की यह मेरा सामाजिक हस्तक्षेप है समाज में ,लेकिन ये सिर्फ मै नहीं कह रहा हु बल्कि हमारी आर्यावर्त की संस्कृति और वेद कह रहे है |ये प्रथा एक पुरुष प्रधान समाज में पुरुषो के खुद के बनाये नियमो की देन है साथ ही मध्यकाल में मुस्लिम हमलो से हुए परिवर्तनों के कारण भी ये प्रगाड़ हो गई |बात सीधी सी है जब पुरुषो का पुनर्विवाह हो सकता है तो महिलाओ का क्यों नहीं ? मतलब की महिलाओ को आप अपने हिसाब से प्रथाओ में बांध दो और पुरुष समाज अपने लिए या कहे अपने हित के लिए कोई ऐसी प्रथा नहीं बनाई ।जबकि वैदिक संस्कृति ये कहती है की विधवा पुनर्विवाह हो सकता है और होता था |मतलब पहले भारत में विधवा पुनर्विवाह होते थे लेकिन पिछली कुछ शताब्दियों से विधवा पुनर्विवाह करना बंद कर दिया गया ,जबकि कोई महिला चाहती हैकि उसका पुनर्विवाह हो तो यह किया जाना चाहिए | यहाँ पर वेदों में विधवा पुनर्विवाह के लिए कहा गया है जैसे :-ऋग्वेद की ये ऋचा (मंत्र ) कुह स्विद्दोषा कुह ................| को वां शयुत्रा .......................|| (ऋ ० मं० १० |सु ० ४० |मं ० २ ||) इस मंत्र में विधवा स्त्रियों को अपने पति के साथ संतान उत्पन्न करने को कहा गया है मतलब की विधवा पुर्विवाह को यहाँ भी समर्थन है | इसी प्रकार मनु स्मृति में भी कहा गया है तमनेन विधानेन............||मनु ०|| यहाँ पर भी विधवा विवाह करने को कहा गया है | (यहाँ पर मंत्र संस्कृत में टाइप करने में असुविधा के कारण पुरे नहीं लिखे गए लेकिन उनके श्लोक क्रमांक दिए गए है ) इसके अतिरिक्त और भी प्रमाण है जो वेदों में मंत्रो के रूप में है जिनके आधार पर हम कह सकते है कि विधवा पुनर्विवाह करने में कोई बुराई नहीं है। अब ये राजपूत समाज क्यों प्राचीन आर्यवर्त और भारत वर्ष की परम्पराओ से मुख मोड़कर गलत सोच से प्रभावित है ....??.क्या परिवार वाले ऐसी महिलाओ का पुनर्विवाह नहीं कर सकते जो दुर्भाग्य वश बहुत कम उम्र में ही विधवा हो चुकी है ....??जैसे पुरुष पुनर्विवाह कर सकते है, वैसे ही महिलाओ को भी ये अधिकार होना चाहिए वे भी दुर्भाग्य वश विधवा होने पर पुनर्विवाह कर सके ....................मेरा उद्देश्य यह लेख लिख कर सामाजिक ताने बाने को नुकसान पहुचाना नहीं ,बल्कि उसे सुधारकर जागरूकता लाकर वैदिक और आर्यावर्त कि संस्कृति के अनुसार सामाजिक परिवर्तन करना है ,क्योकि हमारे पूर्वज जो वैदिक संस्कृति का पालन करते थे वो इसी प्रकार कि सामाजिक माहौल में रहते थे ,जहा पर विधवा पुनर्विवाह को अनुमति थी |.........सभी राजपूत क्षत्रिय और क्षत्राणी भारत वर्ष कि आर्य संस्कृति को फिर से स्थापित करने के लिए कुछ अच्छे सामाजिक परिवर्तन करे|. जय हाडा रानी ....जय धाय माँ पन्ना ....जय क्षात्र धर्म .....जय आर्यावर्त....जय भारत वर्ष आपका राजपूत बन्धु -
विजेंद्र सिंह शेखावत (राजपूतो में वैचारिक और सामाजिक परिवर्तन करने के लिए एक छोटा सा प्रयास )
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दुनिया
जब मैं छोटा था, शायद दुनिया बहुत बड़ी हुआ करती थी..
मुझे याद है मेरे घर से "स्कूल" तक का वो रास्ता, क्या क्या नहीं था
वहां, चाट के ठेले, जलेबी की दुकान, बर्फ के गोले, सब कुछ,
अब वहां "मोबाइल शॉप", "विडियो पार्लर" हैं, फिर भी सब सूना है..
शायद अब दुनिया सिमट रही है...
जब मैं छोटा था, शायद शामे बहुत लम्बी हुआ करती थी.
मैं हाथ में पतंग की डोर पकडे, घंटो उडा करता था, वो लम्बी "साइकिल रेस",
वो बचपन के खेल, वो हर शाम थक के चूर हो जाना,
अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है और सीधे रात हो जाती है.
शायद वक्त सिमट रहा है.. .....
जब मैं छोटा था, शायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी,
दिन भर वो हुज़ोम बनाकर खेलना, वो दोस्तों के घर का खाना, वो लड़कियों की
बातें, वो साथ रोना, अब भी मेरे कई दोस्त हैं,
पर दोस्ती जाने कहाँ है, जब भी "ट्रेफिक सिग्नल" पे मिलते हैं "हाई" करते
हैं, और अपने अपने रास्ते चल देते हैं,
होली, दिवाली, जन्मदिन , नए साल पर बस SMS आ जाते हैं
शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं.. .....
जब मैं छोटा था, तब खेल भी अजीब हुआ करते थे,
छुपन छुपाई, लंगडी टांग, पोषम पा, कट थे केक, टिप्पी टीपी टाप.
अब इन्टरनेट, ऑफिस, हिल्म्स, से फुर्सत ही नहीं मिलती..
शायद ज़िन्दगी बदल रही है
मुझे याद है मेरे घर से "स्कूल" तक का वो रास्ता, क्या क्या नहीं था
वहां, चाट के ठेले, जलेबी की दुकान, बर्फ के गोले, सब कुछ,
अब वहां "मोबाइल शॉप", "विडियो पार्लर" हैं, फिर भी सब सूना है..
शायद अब दुनिया सिमट रही है...
जब मैं छोटा था, शायद शामे बहुत लम्बी हुआ करती थी.
मैं हाथ में पतंग की डोर पकडे, घंटो उडा करता था, वो लम्बी "साइकिल रेस",
वो बचपन के खेल, वो हर शाम थक के चूर हो जाना,
अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है और सीधे रात हो जाती है.
शायद वक्त सिमट रहा है.. .....
जब मैं छोटा था, शायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी,
दिन भर वो हुज़ोम बनाकर खेलना, वो दोस्तों के घर का खाना, वो लड़कियों की
बातें, वो साथ रोना, अब भी मेरे कई दोस्त हैं,
पर दोस्ती जाने कहाँ है, जब भी "ट्रेफिक सिग्नल" पे मिलते हैं "हाई" करते
हैं, और अपने अपने रास्ते चल देते हैं,
होली, दिवाली, जन्मदिन , नए साल पर बस SMS आ जाते हैं
शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं.. .....
जब मैं छोटा था, तब खेल भी अजीब हुआ करते थे,
छुपन छुपाई, लंगडी टांग, पोषम पा, कट थे केक, टिप्पी टीपी टाप.
अब इन्टरनेट, ऑफिस, हिल्म्स, से फुर्सत ही नहीं मिलती..
शायद ज़िन्दगी बदल रही है
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जन्नत की 72 हूरें (अप्सरायें)
रात को सोते समय श्रीमती ने पूछ लिया - "क्यों जी आपको स्वर्ग में 72 हूरें मिल जायेंगी तो आप क्या करोगे"। हमने कहा - " बिल्कुल आपकी तरह दिखती होंगी तो ठीक वरना हम लौटा देंगे।" श्रीमति प्रसन्न होकर सो गयीं और हम भी नींद के आगोश मे चले गये।" सपने में हमने देखा कि हम अस्पताल में भर्ती हैं और हमें स्व. श्रीलाल शुक्ल जी की तरह ज्ञानपीठ पुरुस्कार देने स्वयं राज्यपाल आये हैं। हमें तभी अंदर से सदबुद्धी ने टोका- " तुझे कहीं पुरूस्कार मिल सकता है रे बुड़बक।" हमनें जवाब दिया- " मियां जिस तरह पुरूस्कारों का स्तर गिर रहा है, हमारे बुढ़ाते तक ज्ञानपीठ पुरुस्कार भी ऐरे गैरों को मिलने लगेगा।" खैर साहब फ़िर हम सपने में टपक गये और सीधा स्वर्ग या कहें जन्नत के दरवाजे में पहुंचे।
वहां एक पंडित टाईप और एक मौलवी टाईप द्वारपाल खड़े थे। हमसे पूछा गया कि हिंदू हो या मुसलमान। हमें तत्काल 72 हूरों की बात याद आयी, चूंकि हम ब्राह्मण हैं और वेद पुराण भी बांची है। तो हमे हमे पता था कि अप्सराओं का जिक्र तो है, पर कितनी मिलेंगी इसकी कोई गारंटी नही दी गयी है। सो हमने मुसलमान वाला आप्शन चुना। मौलवी द्वारपाल ने हमारा हिसाब निकाला, बड़े गौर से पढ़ने लगा कि हमे जन्नत अता की जाये या दोजख में धकेल दिया जाये। आखिर में उसने घोषणा की - " वैसे तो जनाब व्यंग्यकार थे और जो लिखा उससे लोग जले भुने ही हैं और नेकी का कोई काम भी नही किया है। पर कर्तव्य की सीमा से आगे बढ़ कर खतरनाक बीबी की मौजूदगी के बावजूद, तहे दिल से घर का झाड़ू, पोछा, बर्तन, चौका करने और बीबी की झिड़कियों को सुनने के बावजूद इसने इसका दोष कभी अल्लाह को न दिया। हर दम अपनी बेवकूफ़ी को ही कोसता रहा। गोया इसे दोजख में मिलने वाले सारे दंड जमीन पर ही मिल चुके है। इसलिये इस इंसान को जन्न्त अता फ़रमाई जाती है।"
हमें जन्नत के अंदर ले जाया गया और द्वारपाल ने 72 हूरों को बुलवाया और उनसे कहा लो जन्नत का मजा अब ये तुम्हारे हवाले। हम सकपकाये कहा- " हुजूर जन्नत का मजा लेने हम आये हैं कि ये हूरें। द्वारपाल ने ठहाका लगाया - "बड़े व्यंग्यकार बने फ़िरते थे मियां, हम तो मजाक कर रहे थे और आप हैं कि घबरा गये।"
खैर साहब द्वारपाल ने बुरका पहनी हूरों को हमारे हवाले किया। हमने कहा- हुजूर जन्नत में भी बुरका। " द्वारपाल बोला- "आदमी को 72 मिलें या 72 सौ, मन तो उसका भरता नही और जन्न्त में परायी औरत पर नजर टिकी नही कि सीधे दोजख मे डाल दिया जाता है। सो आप जैसे लंपट जन्नत का मजा ले सके इसलिये ये सावधनी बरती गयी है। द्वारपाल के जाने के बाद हम नर्विसिया गये, मुसलमान होते तो कम से कम चार को संभालने का अनुभव होता यहा तो हम एक भी ठीक से हैंडल न कर पाये थे और अब मामला 72 को संभालने का था।
हमने सोचा जब जन्न्त में ही रहना है तो जल्दबाजी कैसी, जरा टहल लिया जाये। सो हमने 71 हूरों से अलग अलग तरह के पकवान बनाने को कहा और एक को साथ ले निकल पड़े। सैर के दौरान हमने हूर से गुजारिश की- " बेगम जरा अपना चेहरा तो दिखाओं।" हूर ने सकुचाई सी मीठी आवाज में कहा- " हम केवल हरम में बुरका हटा सकते हैं बाकी जगह पाबंदी है"। हमने सोचा, खामखा हड़बड़ी की तो जमीन की बेगम की तरह इन बेगमो पर भी हमारा गलत इंप्रेशन पड़ जायेगा। एक बार इज्जत गवांई तो चौका बर्तन ही नसीब होता है इस बात का हमे अनुभव था ही।
घूमते घूमते हमें एक और जन्नत नशीं सज्जन मिलें, वे पूरे काफ़िले साथ थे। दुआ सलाम हुयी, हमने कोने में लेकर पूछा- "72 बेगमों को हैंडल कैसे किया जाये, आपने अलग अलग दिन बांधे है कि कोई और व्यवस्था की है।" वे हसने लगे बोले - "मियां अब आप जमीन पर नही जन्नत में हो, यहां ये नही कि दस पराठे खाये और पेट भर गया चाहो तो हजार खा लो।" हमने सोचा ये बात तो अपने भेजे में आयी ही न थी। खुदा ने 72 हूरें दी है तो सोच समझ कर ही न जन्नत आखिर जन्नत कहलाती किसलिये है। हमने सज्जन से हंसी खुशी विदा ली और हूर से कहा अब हम हरम में आराम करना चाहेंगे।
हरम पहुंच कर, बड़े चाव से हमने पकवानों का मदिरा का जी भर आनंद लिया। अब आप ये मत सोच लेना कि चाहे सौ पैग पिये और चढ़ी नह॥ चढ़ी पर बस इतनी कि सुरूर आ जाये, उसके बाद हमने बत्तियां बुझाने का आर्डर फ़रमाया। फ़िर हुआ क्या ये तो न बता पायेंगे पर तत्काल हरम से दौड़ते भागते हम द्वारपाल के पास पहुंचे। द्वारपाल ने पूछा- क्या हुआ मियां, खैरियत तो है। हमने कहा - " हुजूर आपसे गड़बड़ हो गयी वो हूर तो हैं पर हूर नही है" द्वारपाल बोला - "मियां हूर तो हैं पर हूर नही है ये क्या कह रहे हो। " हमने फ़ुसफ़ुसाकर कान में कहा- " हुजूर जो हूर आपने दी हैं वो न तो खातून है और न ही मर्द।" द्वारपाल हसने लगा - "मियां और तुम खुद क्या हो ये तो देखो।" हमने देखा तो हम और बौखला गये, हम भी उन खातूनों की तरह बीच का मामला बन चुके थे।
हम द्वारपाल के सामने मिमियाये - "हुजुर, कम से कम हम को तो ठीक कर दो।" द्वारपाल और जोर से हंसा- "मियां तुम अभी तक जमीन मामलो में अटके हो, मरने के बाद तो रूह ही जन्नत में आती है शरीर थोड़ी न आता है। रूह तो न आदमी होती है और न औरत, वो तो मां के पेट अल्लाह उसे आदमी और औरत में तक्सीम कर देता है।"
हमने पूछा- " फ़िर उन हूरों का क्या करें।" द्वारपाल बोला - "अबे रूह हो, रुहानी मजा लो।" हम गुस्से में आ कर जन्नत के बाहर भागने लगे तो द्वारपाल ने पकड़ा- " अब कहा जा रहे हो तुम।" हमने कहा- " उस धोखेबाज, कमीनी तस्लीमा नसरीन को पीटने। खामखा लोगो को बरगलाती है कि आदमी है तो जन्नत में हूरो के साथ ऐश करेगा और औरत हो तो जमीन में ही ऐश कर लो।"
तभी हमारी आंख खुली तो हमारा बेटा हमें झकजोर रहा था - " पापा उठो किसको धोखेबाज, कमीनी कह के नींद में चिल्ला रहे हो।" तभी पीछे से श्रीमती की आवाज गूंजी - " रहने दे बेटा, कल हूर की बात की थी तो सपने में किसी हूर के पास पहुंच गये होंगे, उसने भगाया होगा तो बड़बड़ा रहे हैं।" खैर साहब हमने राहत की सांस ली कि जिंदा भी है और 72 हूरें न सही, हमारी रग रग पहचानने वाली श्रीमती तो है। और उनके रहते हमारा जन्नत जाना तय है यह तो आप अब तक जान ही चुके होंगे।
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सेक्सी
नुक्कड़ पर बैठे हम मिलावटी कत्थे वाला पान चबा ही रहे थे कि उधर से गुजरता कालू गरीब हमे देख रूक गया। हमसे बोला - "दवे जी, ये सेक्सी किस बला का नाम है।" हमने कालू की तरफ़ गौर से देखा और यह तय करने की कोशिश करने लगे कि यह सेक्सी के बारे में जानकारी रखने का पात्र है कि नही। फ़िर हमने तय किया कि सूचना के अधिकार के तहत इसे इस विषय पर सूचना दी जा सकती है। सो हमने महिला आयोग की अध्यक्षा अनादरणीय ममता जी की राय बताई - "मिया कालू बात ऐसी है कि सेक्सी का अर्थ सुंदर होता है।" कालू न अपना सर खुजाया- " भैया फ़िर सुंदर शब्द में क्या बुराई कि लोग हाय तौबा मचा रहे हैं।" हमने अपने मुह मे कुचले जा रहे पान पर गौर फ़रमाया साफ़ नजर आ रहा था कि ये कालू हमारे पान का बलिदान व्यर्थ करवा कर ही दम लेगा। सो हमने बेमन से पान को थूका और कालू को खींच अपने पास खड़ा किया और बोले -"अबे पांच रूपये के पान का कत्ल तो करवा के ही चैन मिला तुझे खैर अब ध्यान से सुन। ये सेक्सी वाला लफ़ड़ा आदमियो पर लागू नही होता। इतना कहते ही हम ठिठक गये, तकनीकी रूप से हमारी बात सही नही बैठ रही थी। आजकल गे वाला लफ़ड़ा भी जोरो पर है। हर दिन फ़ेस बुक पर हमे कोई न कोई बंदा हमे सेक्सी और हैंडसम करार देता है। पता करने वाली बात सिर्फ़ इतनी बाकी है कि भाईयो को हम आगे से सेक्सी नजर आते हैं कि पीछे से।
खैर इस तकनीकी मामले का बोझ कालू पर न डालते हुये, हमने बात आगे बढ़ाई। बोले " रै कालू , ये सेक्सी कहो या सुंदर, ये लड़कियो पर ही लागू होता है। अब सामने से आती हुयी उस लड़की को सुंदर कह दें तो खा वो बुरा मान जायेगी या खुश भी हो सकती है। अब मियां यह तो ऐसा मामला है कि ठीक ठीक कहा नही जा सकता। इस लिये कई लोग सेक्सी शब्द का बुरा मना रहे हैं। कालू मानने को खाली न हुआ, बोला- " भईया आप साफ़ मतलब नही बता रहे हो। हमको सेक्सी का हिंदी अर्थ बताओ पहेलियां न बुझाओ। हमने टरकाने के उद्देश्य से कहा- " भाई कालू, सेक्सी का कोई ठीक ठीक मतलब नही है। सुंदर लड़कियो को सेक्सी कहते हैं ऐसा ही सुना है हमने तो।"
लेकिन कालू युपी चुनाव के कारण अपनी ताकत पहचान चुका था। भड़क कर जोर से बोला- हां भैया, ब्राह्मण हो हम दलितो, अल्पसंख्यको, पिछड़ो तक जानकारी पहुंचने क्यो दोगे। बहन जी, कहती ही हैं कि मनुवादी, सामंतवादी सोच वाले हमको पिछड़ा रखना चाहते है। इसिलिये आप सेक्सी का मतलब नही बता रहे हो।"
अब तक चारो ओर भीड़ जमा हो चुकी थी और सारे कालू से सहमत भी नजर आ रहे थे। हमने माथा ठोक लिया, वाह रे राजनीती सेक्सी तक को घसीट लिया। अब हमने कालू को गुस्से से घूरा- "अबे सुन, अब हम कहेंगे और टोकना मत बीच में, आज बहन जी को दलित सेक्सी नजर आ रहे है। मुलायम को यादव और मुसलमान॥ कांग्रेस को दलित और मुसलमान। भाजपा को बाबा रामदेव और बिना जाति के हिंदु। अब समझा सेक्सी का मतलब कि नही।"
लेकिन साहब पूंजिवादियो के शब्दो में कहा जाये तो, कालू समझदार ही होता तो गरीब क्यो रहता। सो कालू ने इंकार में सर हिला दिया। हमने दूसरी तरीके से समझाने की कोशिश की- " देख भाई सेक्सी ऐसा शब्द है जो बजरंग दल की नजर में संस्कृति विनाशक, जमाते इस्लामी की नजर मे कुफ़्र, भाजपा की नजर में बेशर्मी है। रही कांग्रेस की बात, तो जब तक प्रियंका पर इसका उपयोग न किया जाये। उन्हे इस शब्द से कुछ खास दिक्कत नही है।"
हमने फ़िर कालू की तरफ़ देखा, घोंचू फ़िर भी इंकार में सर हिला रहा था। हम और भड़क गये कहा -"अबे बात तो पूरी होने दे क्या विपक्षी पार्टियो की तरह हर बार मुंडी हिला दे रहा है। ध्यान से सुन, दिल्ली के मिरांडा कालेज यह शब्द आम है, खालसा कालेज मे खास। मदरसो में इस शब्द के प्रयोग पर जूते पड़ सकते है। होटल ताज में मिलने वाला हर युवा "बड़े सेक्सी नजर आ रहे हो" जुमले का प्रयोग करता है। वहां पर, यह शब्द इतना इज्जतदार है कि भाई अपनी बहन पर भी इस जुमले का इस्तेमाल कर लेता है। अपने छत्तीसगढ़ी में सेक्सी को "ठांय, ठांय़" कहा जाता है। तो बाम्बे के मिडल क्लास में सेक्सी को "झकास" कहा जाता है।"
"और सुन, अलग अलग लोगो को अलग अलग चीज सेक्सी लगती है। नेताओ को मंत्री पद तो अफ़सरो को पोस्टिंग सेक्सी नजर आता है। ठेकेदार को सूखा और बाढ़ राहत से सेक्सी कुछ नही दिखता, तो सीजन आने पर कुत्ते को कुतिया से सेक्सी कुछ नही। मियां यह सेक्सी शब्द ईश्वर की तरह सर्वव्यापी है। भैस, गधा, घोड़ा चिडिया सब को अपना साथी टाईम, टाईम पर सेक्सी दिखता है। और इंसान को टाईम, बेटाईम भी सेक्सी देखने में कोई गुरेज नही है। इंसान और जानवरो में अंतर सिर्फ़ इतना है कि यह सेक्सी दिखना, जब बंद कमरे मे होता है तो सभी धर्मो की पताकाये आसमान में लहराने लगती है। और खुले में धोखे से भी नजर आ जाने पर सारे धर्म धार्मिक शोक की घोषणा कर झंडा आधा झुका लेते हैं।
इतना कहते कहते, मैं हांफ़ गया। लोगो ने पानी पिलाकर मुझे फ़िर से नार्मल किया। तो मैने देखा, कालू अब भी नाखुश था। उसके भेजे में बात नही घुसी थी। इतना समझाने पर भी न समझ पाने का मलाल उसके चेहरे पर साफ़ देखा जा सकता था। हमे दया आ गयी, हमने कहा -"गलती तेरी नही है भाई कालू। बड़े बड़े रिषी मुनी भी इस सेक्सी चीज को समझ नही पाये है, अब तू एक्दम ध्यान से सुन। देख मामला ऐसा है कि कम कपड़े पहनने वाली लड़कियो को सेक्सी कहा जाता था। पर अब जमाना बदल रहा है, आजकल हाई सोसाईटी के लोग पूरा श्रंगार की हुयी दुलहन को भी उसके होने वाले पति के सामने सेक्सी कह देते हैं।"
कालू ने प्रश्न किया- "भैया ये सेक्सी बनना तो बहुत खतरनाक काम है। कम कपड़े पहनेंगे तो गुंडे पीछे नही पड़ जायेंगे।" हमने सर हिलाया, " सारा लफ़ड़ा चालू वही से हुआ है रे भाई। बीच में विश्व भर मे माडर्न लड़कियो ने प्रदर्शन किये है, कि हम कपड़े पहने, कम पहने, न पहने पर हमारे पीछे मत पड़ो।" कालू ठठा कर हसा - "वाह रे मूर्खन की बुद्धी, अब कोई बोर्ड लगायेगा कि चोरी मत करो तो क्या चोर मान जायेगा।" हमने कालू को गले से लगा लिया- "वाह अब बात तेरे समझ मे आ ही गयी, बधाई हो।" कालू ने फ़िर झटका दिया- "सेक्सी का मतलब कहा बताये हो अभी।"
हमने कहा- "मिया कालू आगे की बात बहुत गहरी है और ध्यान से सुन। देख इस सेक्सी शब्द से अपना कोई लेना देना नही है, खास कर अपने भारत में। देख भाई, हमारे यहां जब कोई लड़का किसी लड़की को देखता है। तो उसे तड़ से अपने मन के बैडरूम के मखमली बिस्तर में ले जा शुरू नही हो जाता। भाई सुंदर लड़किया सिर्फ़ सुंदर नजर आती है बस। उनसे बात करने की इच्छा होती है। उसके साथ समय बिताने की इच्छा होती है। मियां सो भारत में किसी भी लड़की को सेक्सी नही कहा जा सकता। हां विदेशो मे या इंडिया मे जहां स्त्री का अर्थ सिर्फ़ उसके तन से हो सेक्सी कहा जा सकता है।
कालू को बड़ी देर बाद यह बात समझ में आई कि जिससे वह सेक्सी का अर्थ पूछ रहा है उसे खुद ही नही मालूम। उसने हमारा दिल रखने के लिये कहा -"भैया मै समझ गया" और हमसे विदा ली। हमने भी चैन की सांस ली। जब से ये मुआ टीवी गांव गांव में पहुंच गया है नुक्कड़ में बैठना खतरे से खाली नही। पता नही कब क्या पूछ बैठे।
