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एक बेटा विदेश में धन कमाने गया. वहां से उसने माँ को अपनी दिनचर्या बताई ...

सुबह उठकर घर की साफ़ सफाई , फिर स्नान , फिर पूजा पाठ, फिर नाश्ता बनाना,
फिर घर के सभी दरवाजे अच्छे से बंद करके घर को सुरक्षित करके काम पर जाना, आते
समय सब्जी भाजी की खरीदारी, घर आकर खाना बनाना, खाकर बर्तन वगरे साफ़ करना. फिर
प्रभु का नाम लेकर सो जाना.

माँ ने पुछा -- बेटा घर के बाथरूम भी तुम साफ़ करते हो ?

बेटे ने कहाँ - हाँ माँ,
माँ ने पुछा - बेटा झाड़ू-पोंछा , बाजार हाट भी सब तुम्ही को करना पड़ता हैं ?
बेटे ने कहाँ - हाँ माँ
माँ ने पूछा - बेटा घर की सुरक्षा , हिसाब किताब, फिर पूजा पाठ भी सब तू करता हैं ?

बेटे ने कहाँ - हाँ माँ..सबकुछ मैं ही करता हूँ.
माँ ने कहा बेटा तू तो अब इंसान हो गया रे.
बेटे ने आश्चर्य से पूछा -- इंसान बन गया मतलब ??

माँ ने कहा -- तू चारों वर्णों के काम बिना किसी संकोच के स्वयं करता हैं..
पंडित का भी..शुद्र का भी ..वैश्य का भी और क्षत्रिय के समान घर की रक्षा का काम भी तू ही करता हैं. मुझे गर्व हैं की तू जातिवाद और वर्ण वाद से बहुत ऊपर उठकर अब इंसान बन गया हैं..............


माहौल में कैसे मिले युवाओं को अवसर
कहीं इंटरनेट युवा पीढ़ी को तबाह ना कर द
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आज के समय पूरी दुनिया सिमट कर हमारी उंगलियों पर आ गयी है और यह सब संभव हो पाया है केवल सूचना प्रौधोगिकी के कारण और इस सूचना प्रौधोगिकी का सारा आधार है इंटरनेट । दुनिया में सबसे ज्यादा इंटरनेट प्रयोग करने वालों की संख्या चीन में है और भारत जैसे देश मे भी लगभग 30 करोड़ लोग वर्तमान समय में इंटरनेट का प्रयोग कर रहे है !!

इंटरनेट जिस के फायदे बहुत है तो इसके खतरे भी बहुत है ...
आज इंटरनेट पर दुनिया भर की इतनी अधिक जानकारियां उपलब्ध है, जिनके फायदें बहुत है तो नुकसान भी कम नहीं है , जैसे कि हम देख सकते कि आज इंटरनेट पर बम बनाने के तरीके आसानी से उपलब्ध है और चाइल्ड़ पोनोग्राफी जैसी सामग्री जिस का बेजा इस्तेमाल आज की पीढ़ी कर रही है,इन्टरनेट इस्तेमाल करने वाले अधिकतर व्यक्ति पोर्न साईट यूज करते ही हैं, 100 में से 80 जनों ने ऐसी साइटें कभी ना कभी विजिट कि ही होगी || 

लेकिन अब जो खुलासे मै करने वाला हूँ अपने इस लेख के माध्यम से शायद उसको पढ़ के हर माता पिता सोचने पे मजबूर हो जाये .. और पानी सर के ऊपर से गुजरे , उससे पहले इसको रोकने के लिए हमारी सरकार कुछ कड़े कदम उठाये !! 

भारत में आज कल हर युवा इन्टरनेट का प्रयोग करता हे .. अधिकतर घरो में इंटरनेट की सुविधा ले रखी है, बच्चे अपने पेरेंट्स को कहते है की उन्हें इन्टरनेट जरुरी है और वो दिन भर उसका इस्तेमाल करते है .. माता पिता को लगता है की बच्चा पढ़ रहा है, लेकिन शायद वो नहीं जानते की बच्चा इंटरनेट के माध्यम से घर में बैठे हुए ही, किस नयी दुनिया में सफ़र कर रहा है , किन नए लोगो से मिल रहा है और जाने क्या क्या नयी बाते सीख रहा है !!

इन्टनेट की सोशल वेब साइट्स जैसे ऑरकुट , याहू , फेसबुक बच्चो के बीच में बहुत ही फेमस है वो दिन में घंटो, इन्ही पे बिता देते है ||

में इन्टरनेट का रेगुलर यूज करता हूँ और जितनी भी सोशल साइट्स है, करीब करीब सब मैंने युज की है || दिखने में सब कुछ सिम्पल सा लगता है लेकिन जब आप इन का यूज करोगे तो आप को पता चलेगा की हकीकत कुछ और है, और ये साइट्स आज की युवा पीढ़ी को सेक्स ज्ञान के आलावा कुछ और नहीं बाँट रही है|| 

मैंने इस पे काफी सर्च किया है , और याहू इस के चाट रूम में खाली सेक्स पे बात होती है, इन चाट रूम में आप को 15 साल के छोटे बच्चे से लेकर के 50 साल के शादी शुदा लोग मिल जायेंगे जो विर्चुली सेक्स करते है , ओन वेब केम, यदि आप के पास वेब केम है तो आप अपने इशारे पे सामने वाले से कुछ भी करा सकते हो, कुछ भी मतलब हर तरह की अश्लील हरकतें वो भी लाइव ||

इन चाट रूम में वाइफ स्वेपिंग , कॉल गर्ल , कॉल बॉय आसानी से मिल जायेंगे और १८ से २८ साल के लड़के- लड़कियां आपस में सेक्स करने के लिए हमेशा तैयार मिलेंगे 

और यदि आप एक ही शहर के है और किस्मत साथ दे तो शायद आप रियल लाइफ तक, अपनी विर्चुअल लाइफ को ले जाए , मतलब एक आसन सा जरिया सेक्स मार्केटिंग का !!
साइबर क्राइम को रोकने के लिए सरकार के पास कोई सख्त क़ानून नहीं है , यही वजह है कि सेक्स माफिया अब इन्टरनेट युजर को अपना निशाना बना रहें है , पहले वो आप को यहाँ सेक्स का ज्ञान देंगे , आप को विर्चुअल सेक्स के लिए प्रेरित करेंगे , फिर यदि आप उनके झांसे में फस कर कुछ पलों के मनोरंजन के लिए उनके इशारे पे काम करते है , तो वो आप का वेबकैम विडियो सेव करके उसे इन्टरनेट के माध्यम से अश्लील वेब साइटों पे डाल देंगे, आप को पता भी नहीं चलेगा और आप एक छोटी सी गलती बना देगी , आप को रातों रात एक पोर्न स्टार ||

मेरी समाज के प्रबध जनों , संपादकों , न्यूज़ चेनल , और दूसरी सामाजिक संस्थाओं से इस लेख के माध्यम से निवेदन है कि हमारी युवा पीढ़ी कि , हमारी संस्किर्ती कि रक्षा के लिए, इस दिशा में कुछ सोचें || मै खुद एक जनहित


मित्रो समय हो तो जरुर पढजो... 
1)अगर
लगातार दौडने से लक्ष्मी मिलती तो, आज
कुत्ता लक्ष्मीपति होता..
2)मौत रिश्वत
नही लेती लेकिन, रिश्वत मौत ले लेती है..

3)काम मेँ ईश्वर का साथ मांगो लेकिन, ईश्वर
काम कर दे ऐसा मत मांगो..

4) कडवा सत्य
एक गरीब पेट के लिए सुबह जल्दी उठकर दोडता है
और
एक अमीर पेट कम करने के लिए सुबह जल्दी उठकर
दौडता है..

5) 50 रुपे मेँ 1 लीटर कोल्डंड्रीक आती है..जिसमे
स्वाद और पोषण जीरो..
और कमाता कौन?
मल्टीनेशनल कम्पनिया
और
उसके सामने 50 रुपे मे 1 किलो फल आते है स्वाद
भरपुर और पोषण लाजवाब और कमाता कौन?
धुप मेँ,सर्दी मेँ,बरसात मेँ लारी लेकर
घुमता अपना एक गरीब भारतवासी..

6) सबंध भले थोडा रखो लेकिन,
एसा रखो कि शरम किसी की झेलनी ना पडे मौत
के मुह से जिदंगी बरस पडे और
मरने के बाद शमशान की राख भी रो पडे..

7) जब
तालाब भरता है तब,
मछलीया चीटीँयो को खाती है और जब तालाब
खाली होता है तब
चीटींया मछलियो को खाती है
मौका सबको मिलता है
बस अपनी बारी का इन्तजार करो..

8)दुनिया मेँ दो तरह के लोग होते है.. एक
जो दुसरो का नाम याद रखते है और
दुसरा जिसका नाम दुसरे याद रखते है..

9) सुख मेँ सुखी हो तो दु:ख भोगना सिखो जिसको खबर
नही दु:ख की तो सुख का क्या मजा.?

10) जीवन मेँ कुछ बडा मिल जाए तो छोटे को मत भुलना..
क्योकिँ जहा सुई काम हो
वहा तलवार काम नही आती..

11) माँ-बाप का दिल दुखाकर आजतक दुनिया मेँ
कोई सुखी नही हुआ..

12) भगवान का उपकार है कि आँसुऔ को रंग
नही दिया
वरना
रात को भींगा तकिया सवेरे कुछ ना कुछ भैद खोल
देता..

13) जो इंसान प्रेम मेँ निष्फल होता है
वो जिदगी मे सफल होता है..

14) आज करे कल कर कल करे
सो परसो ईतनी भी क्या जल्दी है
जब जीना है बरसो..

15) दुनिया का सबसे
कीमती प्रवाही कौनसा है? आँसु
जिसमेँ
1% पानी
और
99% भावनाए होती है..

16) दुनिया का सबसे अमीर आदमी भी माँ के
बिना गरीब है..

17) गुस्से मे आदमी कभी कभी व्यर्थ बाते
करता है,
तो कभी मन की बात भी बोल देता है..

18) भगवान खडा है तुझे सब कुछ देने के लिए लेकिन तु
चम्मच लेकर खडा है पुरा सागर माँगने के लिए..

19) आप यह पोस्ट पढ रहे हो
ईसका असतित्व आप के माँ बाप है...

20) जिसको सपने देखने की आदत होती है उसके लिए
रात भी कम पडती है
और
जिसको सपने साकार करने की आदत होती है उसके
लिए दिन भी कम पडता है...


मत पूछे के ठाठ भायला | पोळी मै खाट भायला ||
पनघट पायल बाज्या करती ,सुगनु चुड़लो हाथा मै |
रूप रंगा रा मेला भरता ,रस बरस्या करतो बातां मै |
हान्स हान्स कामन घणी पूछती , के के गुज़री रात्यां मै |
घूंघट माई लजा बीनणी ,पल्लो देती दांता मै |
नीर बिहुणी हुई बावड़ी , सूना पणघट घाट भायला |
पोळी मै है खाट भायला ||

छल छल जोबन छ्ळ्क्या करतो ,गोटे हाळी कांचली |
मांग हींगलू नथ रो मोती ,माथे रखडी सांकली |
जगमग जगमग दिवलो जुगतो ,पळका पाडता गैणा मै |
घनै हेत सूं सेज सजाती ,काजल सारयां नैणा मै |
उन नैणा मै जाळा पड़गा ,देख्या करता बाट भायला |
पोळी मै खाट भायला||

अतर छिडकतो पान चबातो नैलै ऊपर दैलो |
दुनिया कैती कामणगारो ,अपने जुग को छैलो हो |
पण बैरी की डाढ रूपि ना, इतनों बळ हो लाठी मैं |
तन को बळ मन को जोश झळकणो ,मूंछा हाली आंटी मै |||
इब तो म्हारो राम रूखाळो , मिलगा दोनूं पाट भायला |
पोळी मै खाट भायला||

बिन दांता को हुयो जबाडो चश्मों चढ्गो आख्याँ मै |
गोडा मांई पाणी पडगो जोर बच्यो नी हाथां मै |
हाड हाड मै पीड पळै है रोम रोम है अबखाई |
छाती कै मा कफ घरडावै खाल डील की है लटक्याई ||
चिटियो म्हारो साथी बणगो ,डगमग हालै टाट भायला |
पोळी मै है खाट भायला ||


उनको ये शिकायत है.. मैं बेवफ़ाई पे नही लिखता,
और मैं सोचता हूँ कि मैं उनकी रुसवाई पे नही लिखता.'

'ख़ुद अपने से ज़्यादा बुरा, ज़माने में कौन है ??
मैं इसलिए औरों की.. बुराई पे नही लिखता.'

'कुछ तो आदत से मज़बूर हैं और कुछ फ़ितरतों की पसंद है ,
ज़ख़्म कितने भी गहरे हों?? मैं उनकी दुहाई पे नही लिखता.'

'दुनिया का क्या है हर हाल में, इल्ज़ाम लगाती है,
वरना क्या बात?? कि मैं कुछ अपनी.. सफ़ाई पे नही लिखता.'

'शान-ए-अमीरी पे करू कुछ अर्ज़.. मगर एक रुकावट है,
मेरे उसूल, मैं गुनाहों की.. कमाई पे नही लिखता.'

'उसकी ताक़त का नशा.. "मंत्र और कलमे" में बराबर है !!
मेरे दोस्तों!! मैं मज़हब की, लड़ाई पे नही लिखता.'

'समंदर को परखने का मेरा, नज़रिया ही अलग है यारों!!
मिज़ाज़ों पे लिखता हूँ मैं उसकी.. गहराई पे नही लिखता.'

'पराए दर्द को , मैं ग़ज़लों में महसूस करता हूँ ,
ये सच है मैं शज़र से फल की, जुदाई पे नही लिखता.'

'तजुर्बा तेरी मोहब्बत का'.. ना लिखने की वजह बस ये!!
क़ि 'शायर' इश्क़ में ख़ुद अपनी, तबाही पे नही लिखता


किसी ने सच ही कहा है कि जिस देश को बरबाद करना हो सबसे पहले उसकी संस्कृति पर हमला करो और वहाँ की युवा पीढी को गुमराह करो । जो समाज इनकी रक्षा नहीं कर सकता उसका पतन और सर्वनाश निश्चित हो जाता है । हमारे आसपास घटने वाली काफ़ी बातें समाज के गिरते नैतिक स्तर और खोखले होते सांस्कृतिक माहौल की ओर इशारा कर रही हैं, एक खतरे की घंटी बज रही है, लेकिन समाज और नेता लगातार इसकी अनदेखी करते जा रहे हैं । इसके लिये सामाजिक ढाँचे या पारिवारिक ढाँचे का पुनरीक्षण करने की बात अधिकतर समाजशास्त्री उठा रहे हैं, परन्तु मुख्यतः जिम्मेदार है हमारे आसपास का माहौल और लगातार तेज होती जा रही "भूख" । जी हाँ "भूख" सिर्फ़ पेट की नहीं होती, न ही सिर्फ़ तन की होती है, एक और भूख होती है "मन की भूख" । इसी विशिष्ट भूख को "बाजार" जगाता है, उसे हवा देता है, पालता-पोसता है और उकसाता है। यह भूख पैदा करना तो आसान है, लेकिन क्या हमारा समाज, हमारी राजनीति, हमारा अर्थतन्त्र इतना मजबूत और लचीला है, कि इस भूख को शान्त कर सके ।दृश्य-श्रव्य माध्यमों का प्रभाव कोमल मन पर सर्वाधिक होता है, एक उम्र विशेष के युवक, किशोर, किशोरियाँ इसके प्रभाव में बडी जल्दी आ जाते हैं । जब यह वर्ग देखता है कि किसी सिगरेट पीने से बहादुरी के कारनामे किये जा सकते हैं, या फ़लाँ शराब पीने से तेज दौडकर चोर को पकडा जा सकता है, अथवा कोई कूल्हे मटकाती और अंग-प्रत्यंग का फ़ूहड प्रदर्शन करती हुई ख्यातनाम अभिनेत्री किसी साबुन को खरीदने की अपील (?) करे, तो वयःसन्धि के नाजुक मोड़ पर खडा किशोर मन उसकी ओर तेजी से आकृष्ट होता है । इन्तिहा तो तब हो जाती है, जब ये सारे तथाकथित कारनामे उनके पसन्दीदा हीरो-हीरोईन कर रहे होते हैं, तब वह भी उस वस्तु को पाने को लालायित हो उठता है, उसे पाने की कोशिश करता है, वह सपने और हकीकत में फ़र्क नहीं कर पाता । जब तक उसे इच्छित वस्तु मिलती रहती है, तब तक तो कोई समस्या नहीं है, परन्तु यदि उसे यह नहीं मिलती तो वह युवक कुंठाग्रस्त हो जाता है । फ़िर वह उसे पाने के लिये नाजायज तरीके अपनाता है, या अपराध कर बैठता है । और जिनको ये सुविधायें आसानी से हासिल हो जाती हैं, वे इसके आदी हो जाते हैं, उन्हें नशाखोरी या पैसा उडाने की लत लग जाती है, जिसकी परिणति अन्ततः किसी मासूम की हत्या या फ़िर चोरी-डकैती में शामिल होना होता है । ये युवक तब अपने आपको एक अन्धी गली में पाते हैं, जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझता । आजकल अपने आसपास के युवकों को धडल्ले से पैसा खर्च करते देखा जा सकता है । यदि सिर्फ़ पाऊच / गुट्खे का हिसाब लगाया जाये, तो एक गुटका यदि दो रुपये का मिलता है, और दिन में पन्द्रह-बीस पाऊच खाना तो आम बात है, इस हिसाब से सिर्फ़ गुटके का तीस रुपये रोज का खर्चा है, इसमें दोस्तों को खिलाना, सिगरेट पिलाना, मोबाइल का खर्च, दिन भर यहाँ-वहाँ घूमने के लिये पेट्रोल का खर्चा, अर्थात दिन भर में कम से कम सौ रुपये का खर्च, मासिक तीन हजार रुपये । क्या भारत के युवा अचानक इतने अमीर हो गये हैं ? यह अनाप-शनाप पैसा तो कुछ को ही उपलब्ध है, परन्तु जब उनकी देखादेखी एक मध्यम या निम्नवर्गीय युवा का मन ललचाता है, तो वह रास्ता अपराध की ओर ही मुडता है । यह "बाजार" की मार्केटिंग की ताकत (?) ही है, जो इस "मन की भूख" को पैदा करती है, और यही सबसे खतरनाक बात है ।
अपसंस्कृति की भूख फ़ैलाने में बाजार और उसके मुख्य हथियार (!) टीवी का योगदान (?) इसमें अतुलनीय है । उदारीकरण की आँधी में हमारे नेताओं द्वारा सांस्कृतिक प्रदूषण की ओर से आँखें मूंद लेने के कारण इनकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने वाला कोई न रहा, जिसके कारण ये तथाकथित "मीडिया" और अधिक उच्छृंखल और बदतर होता गया है । एक जानकारी के अनुसार फ़्रेण्डशिप डे के लिये पूरे देश के "बाजार" में लगभग चार सौ करोड़ रुपयों की (ग्रीटिंग, गुलाब के फ़ूल, चॉकलेट और उपहार मिलाकर) खरीदारी हुई । जो चार सौ करोड रुपये (जिनमें से अधिकतर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की जेब में गये हैं) अगले वर्ष बढकर सात सौ करोड हो जायेंगे, इसका उन्हें पूरा विश्वास है । लेकिन "प्रेम" और "दोस्ती" के इस भौंडे प्रदर्शन में जिस "धन" की भूमिका है वही सारे पतन की जड है, और इसका सामाजिक असर क्या होगा, इस बारे में कोई सोचने को भी तैयार नहीं है । जिस तरह से भावनाओं का बाजारीकरण किया जा रहा है, युवाओं का मानसिक और आर्थिक शोषण किया जा रहा है, वह गलत है, कई बार यह आर्थिक शोषण, शारीरिक शोषण में बदल जाता है । मजे की बात तो यह है कि कई बार कोई दिवस क्यों मनाया जाता है, इसका पता भी उन्हें नहीं होता, परन्तु जैसा मीडिया बता दे अथवा जैसी "भेडचाल" हो वैसा ही सही, जैसा कि वेलेण्टाइन के मामले मे है कि "जिस दिन को ये युवा प्रेम-दिवस के रूप में मनाते हैं दरअसल वह एक शहीद दिवस है, क्योंकि संयोगवश तीनों वेलेण्टाइनों को तत्कालीन राजाओं ने मरवा दिया था, और वह भी चौदह फ़रवरी को" । अब आपत्ति इस बात पर है कि जब आप जानते ही नहीं कि यह उत्सव किसलिये और क्यों मनाया जा रहा है, ऐसे दिवस का क्या औचित्य है ? मार्केटिंग के पैरोकारों की रटी-रटाई दलील होती है कि "यदि इन दिवसों का बाजारीकरण हो भी गया है तो इसमें क्या बुराई है ? क्या पैसा कमाना गलत बात है ? किसी बहाने से बाजार में तीन-चार सौ करोड रुपया आता है, तो इसमें हाय-तौबा क्यों ? जिसे खरीदना हो वह खरीदे, जिसे ना खरीदना हो ना खरीदे, क्या यह बात आपत्तिजनक है ?" नहीं साहब पैसा कमाना बिलकुल गलत बात नहीं, लेकिन जिस आक्रामक तरीके उस पूरे "पैकेज" की मार्केटिंग की जाती है, उसका उद्देश्य युवाओं से अधिक से अधिक पैसा खींचने की नीयत होती है और वह "मार्केटिंग" उस युवा के मन में भी खर्च करने के भाव जगाती है जिसकी जेब में पैसा नहीं है और ना कभी होगा, यह गलत बात है । पढने-सुनने में भले ही अजीब लगे, परन्तु सच यही है कि आज की तारीख में भारत के पचास-साठ प्रतिशत युवाओं की खुद की कोई कमाई नहीं है, और ऐसे युवाओं की संख्या भी कम ही है जिन्हें नियमित जेबखर्च मिलता हो । बाप वीआरएस और जबरन छँटनी का शिकार है, और बेटे को कोई नौकरी नहीं है, इसलिये दोनों ही बेकार हैं और टीवी उन्हें यह "भूख" परोस रहा है, पैसे की भूख, साधनों की भूख । भूख जो कि एक दावानल का रूप ले रही है । इसी मोड पर आकर "सामाजिक परिवर्तन", "सामाजिक क्रान्ति", "सामाजिक असर" की बात प्रासंगिक हो जाती है, लेकिन लगता है कि देश कानों में तेल डाले सो रहा है । आज हमारे चारों तरफ़ घोटाले, राजनीति, पैसे के लिये मारामारीम हत्याएं, बलात्कार हो रहे हैं, इन सभी के पीछे कारण वही "भूख" है । समाजशास्त्रियों की चिंता वाजिब है कि ऐसे लाखों युवाओं की फ़ौज समाज पर क्या असर डालेगी ? लेकिन "मदर्स डे", "फ़ादर्स डे", "वेलेन्टाईन", "फ़्रेण्डशिप डे", ये सब प्रतीक मात्र नहीं है, बल्कि इनसे आपको कमतरी का एहसास कराया जाता है कि यदि आपने कोई उपहार नहीं दिया तो आपको दोस्ती करना नहीं आता, यदि आपने कार्ड या फ़ूल नहीं खरीदा इसका मतलब है कि आप प्रेम नहीं करते, परिणाम यह होता है कि विवेकानन्द या अपने कोर्स की कोई किताब खरीदने की बजाय व्यक्ति किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी की कोई बेहूदा चॉकलेट खरीद लेता है, क्योंकि उस चॉकलेट से तथाकथित "स्टेटस" (?) जुडा है, और यही "स्टेटस" यानी एक और "भूख" । बाजार को नियन्त्रित करने वालों से यही अपेक्षा है कि उस "भूख" को भडकाने का काम ना करें, जो आज समाज के लिये "भस्मासुर" साबित हो रही है, कल उनके लिये भी खतरा बन सकती है ।


प्रिय सुरेश,
कृपया अपने आज के पत्र को सन्दर्भित करें । मुझे आपका यह "ऑफ़र" स्वीकृत करने में खुशी होगी । हालाँकि आपकी "प्रमोशन" सम्बन्धी शर्त आकर्षक है, लेकिन आपके पत्र में सेवा शर्तों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, अतः कुछ बिन्दुओं पर जानकारी एवं स्पष्टीकरण भेजने का कष्ट करें । जैसे आपकी कम्पनी में सेवानिवृत्ति पश्चात मिलने वाले लाभ, "ग्रेच्युटी" की राशि आदि की जानकारी । साथ ही सुरक्षित भविष्य के लिये कृपया आप मुझे लिखित आश्वासन दें कि कोई "छँटनी या तालाबन्दी" आदि नहीं होगी, इसी प्रकार ट्रांसपोर्टेशन एवं रसोई शुल्क आदि की दरें भी केन्द्र सरकार की अनुशंसाओं के अनुसार होना चाहिये ।
यदि इन शर्तों के साथ आप फ़िर भी मुझे अपनी प्रेमिका नियुक्त करना चाहें तो कृपया अतिशीघ्र विस्तृत सूचना के साथ उत्तर भेजने का कष्ट करें, क्योंकि इसी प्रकार के कई ऑफ़र एवं अनुबन्ध मेरे समक्ष लम्बित हैं, उन्हें भी यथासमय उत्तर देना आवश्यक है । साथ ही यह सूचना भी दी जाती है कि मेरी बहन काफ़ी समय पहले "अनुबन्धित" हो चुकी है, और उसके दो बच्चे भी हैं...
तत्काल प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा में
सधन्यवाद
आपकी सम्भावित प्रेमिका
सारिका