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इतने दोस्तो मे भी एक दोस्त की तलाश है मुझे
इतने अपनो मे भी एक अपने की प्यास है मुझे
छोड आता है हर कोइ समन्दर के बीच मुझेअब डूब रहा हु तो एक सािहल की तलाश है मुझे
लडना चाहता हु इन अन्धेरो के गमो सेबस एक शमा के उजाले की तलाश है मुझे
तग आ चुका हु इस बेवक्त की मौत से मैअब एक हसीन िजन्द्गी की तलाश है मुझे
दीवना हु मै सब यही कह कर सताते है मुझेजो मुझे समझ सके उस शख्श की तलाश है मुझे


इस दर्द की तारीफ में क्या-क्या गिला लिखूँ
दिन-रात के फिराक का क्या-क्या सिला लिखूँ
बस्ती में खिला फूल भी बस्ती का हो चुका है
कांटें मिले हैं जिसको उसे मैं दिलजला लिखूं
घर लौटते हैं किसलिए घर के ये लड़ते लोग
नहीं जानता उन्हें तो क्यूं बुरा-भला लिखूं
मेरे सफर में रह न सका कोई मेरे साथ
तन्हाइयों को ही मैं अब सिलसिला लिखूं



रांझा को बचपन में ही खूबसूरती से इश्क था। उसने अपने लिए सपनों में ही एक हसीना की तस्वीर गढ़ ली थी। तख्त हजारा के सरदार का बेटा रांझा आशिक मिजाज था। बारह साल की उम्र में पिता का साया उसके सिर से उठ गया था। अपने भाइयों से अलग होकर वह सारा दिन पेड़ों के नीचे बैठा रहता और अपने सपनों की शहजादी के बारे में सोचा करता था। एक बार एक पीर ने उससे पूछा-तुम इतने दुःखी क्यों हो? तब रांझा ने पीर को अपने द्वारा रचित प्रेम गीत सुनाए, जिसमें सपनों की शहजादी का उल्लेख था। पीर ने बताया कि तुम्हारे सपनों की शहजादी हीर के अलावा और कोई नहीं हो सकती। यह सुन रांझा अपनी हीर की तलाश में निकल पड़ा।
हीर बहुत सख्त दिमाग वाली लड़की थी। एक रात रांझा चुपके से हीर की नाव में सो गया। यह देख हीर आगबबूला हो गई, लेकिन जैसे ही उसने जवाँ मर्द रांझे को देखा, वह अपना गुस्सा भूल गई और रांझा को देखती ही रह गई। तब रांझा ने उसे अपने सपनों की बात कही। रांझे पर फिदा हीर उसे अपने घर ले गई और अपने यहाँ नौकरी पर रखवा दिया।
हीर-रांझा की मुलाकातें मोहब्बत में बदल गई, लेकिन हीर के चाचा को इसकी भनक लग गई और हीर की शादी दूसरे गाँव कर दी गई।


रांझा फकीर बनकर गाँव-गाँव घूमने लगा। जब वह हीर के गाँव में पहुँचा तो उसकी आवाज सुनकर हीर बाहर आई और उसे भिक्षा देने लगी। दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए। रांझा रोजाना फकीर बनकर आता और हीर उसे भिक्षा देने। दोनों रोजाना मिलने लगे। यह हीर की भाभी ने देख लिया। उसने हीर को टोका तो रांझा गाँव के बाहर चला गया। सारे लोग उसे फकीर मानकर पूजने लगे। उसकी जुदाई में हीर बीमार हो गई। जब वैद्य हकीमों से उसका इलाज न हुआ तो हीर के ससुर ने रांझे के पास जाकर उसकी मदद माँगी। रांझा हीर के घर चला आया। उसने हीर के सिर पर हाथ रखा और हीर की चेतना लौट आई। जब लोगों को पता चला कि वह फकीर रांझा है तो उन्होंने रांझा को पीटकर गाँव से बाहर धकेल दिया। फिर राजा ने उसे चोर समझकर पकड़ लिया।

रांझा ने जब राजा को हकीकत बताई तो उसने हीर के पिता को आदेश दिया कि वह हीर की शादी रांझा से कर दे। राजा की आज्ञा के डर से उसके पिता ने मंजूरी तो दे दी, लेकिन हीर को जहर दे दिया। जब रांझा वापस लौटा और उसे हीर के मरने की खबर मिली तो उसने भी वहीं दम तोड़ दिया।

हीर मर गई, रांझा मर गया, लेकिन उनकी मोहब्बत आज भी जिंदा है।


कपड़े हो गए छोटे शर्म कहाँ से हो
अनाज हो गया रासायनिक स्वाद कहाँ से हो
भोजन हो गया डालडा ताकत कहाँ से हो
नेता हो गया कुर्सी का देशमुखी कहाँ से हो
फूल हो गए प्लास्टिक के खुशबू कहाँ से हो
चेहरा हुआ मेक अप का रूप कहाँ से हो
शिक्षक हुए ट्यूशन के विद्या कहाँ से हो
प्रोग्राम हुए चेनल के संस्कार कहाँ से हो
इंसान हुआ पैसों का दया कहाँ से हो
पानी हुआ केमिकल का गंगाजल कहाँ से हो
संत हुए  स्वार्थ के सत्संग कहाँ से हो
भक्त हुए स्वार्थ के भगवान् कहाँ से हो

कुं विजेन्द्र शेखावत
सिंहासन



माशुका को उसकी सहेली ने समझाया
‘आजकल खुल गयी है
सच बोलने वाली मशीन की दुकानें
उसमें ले जाकर अपने आशिक को आजमाओ।
कहीं बाद में शादी पछताना न पड़े
इसलिये चुपके से उसे वहां ले जाओ
उसके दिल में क्या है पता लगाओ।’

माशुका को आ गया ताव
भूल गयी इश्क का असली भाव
उसने आशिक को लेकर
सच बोलने वाली मशीन की दुकान के
सामने खड़ा कर दिया
और बोली
‘चलो अंदर
करो सच का सामना
फिर करना मेरी कामना
मशीन के सामने तुम बैठना
मैं बाहर टीवी पर देखूंगी
तुम सच्चे आशिक हो कि झूठे
पत लग जायेगा
सच की वजह से हमारा प्यार
मजबूत हो जायेगा
अब तुम अंदर जाओ।’
आशिक पहले घबड़ाया
फिर उसे भी ताव आया
और बोला
‘तुम्हारा और मेरा प्यार सच्चा है
पर फिर भी कहीं न कहीं कच्चा है
मैं अंदर जाकर सच का
सामना नहीं करूंगा
भले ही कुंआरा मरूंगा
मुझे सच बोलकर भला क्यों फंसना है
तुम मुझे छोड़ भी जाओ तो क्या फर्क पड़ेगा
मुझे दूसरी माशुकाओं से भी बचना है
कोई परवाह नहीं
तुम यहां सच सुनकर छोड़ जाओ
मुश्किल तब होगी जब
यह सब बातें दूसरों को जाकर तुम बताओ
बाकी माशुकाओं को पता चला तो
मुसीबत आ जायेगी
अभी तो एक ही जायेगी
बाद में कोई साथ नहीं आयेगी
मैं जा रहा हूं तुम्हें छोड़कर
इसलिये अब तुम माफ करो मुझे
अब तुम भी घर जाओ।’

कुं विजेन्द्र शेखावत 
सिंहासन 


जब वोडाफोन के एक विज्ञापन में
दो पैसो मे लड़की पटाने की बातकी जाती है तब कौन ताली बजाता है?पेन्टी हो या पेन्ट हो, कॉलगेटया पेप्सोडेंट हो,साबुन या डिटरजेण्ट हो , कोईभी विज्ञापन हो,1.सब में ये छरहरे बदन वाली छोरियो केअधनंगे बदन को परोसना क्या नारीत्व केसाथ बलात्कार नहीं है?2. फिल्म को चलानेके लिए आईटम सॉन्ग केनाम पर लड़कियो को जिस तरहमटकवाया जाता है या यू कहे लगभगआधा नंगा करके उसके अंग प्रत्यंगको फोकस के साथ दिखाया जाता हैवो स्त्रीयत्व के साथ बलात्कारकरना नहीं है क्या?3. पत्रिकाए हो याअखबार सबमेआधी नंगी लड़कियो के फोटो किसके लिएऔरक्या सिखाने के लिए भरपूर मात्र मे छापेजाते है? ये स्त्रीयत्व का बलात्कारनहीं है क्या?4. दिन रात , टीवी हो या पेपर , फिल्मेहो या सीरियल, लगातार स्त्रीयत्वका बलात्कार होते देखने वाले, और उस परखुश होने वाले, उस का समर्थन करने वालेक्या बलात्कारीनहीं है ?5. संस्कृति के साथ , मर्यादाओ के साथ,संस्कारो के साथ, लज्जा के साथ जो ये सबकिया जा रहा है वो बलात्कार नहीं हैक्या?6. निरंतर हो रहे नारीत्व के बलात्कार केसमर्थको को नारी के बलात्कार पर शर्मआना उसी तरह है जैसे मांस खाने वाला ,लहसुन प्याज पर नाक सिकोडेजिस देश में "आजातेरी _ मारू , तेरे सर से __का भूत उतारू" जैसा गाना गानेवाला हनीसिंह ,सीरियल किसर कहे जाना वाला इमरानहाशमी,और इसी तरह का नंगा नाच फैलाने वालेभांडयुवाओ के " आइडल" बन रहेहो वहा बलात्कार औरछेडछाड़ की घटनाए नहीं तो औरक्या बढ़ेगा?कुल मिलाकर मेरे कहने का अर्थ ये है भाईकि जबहम स्त्रीयत्व का सम्मान करना सीखेंगेतभी हमनारी का सम्मान करना सीख पाएंगे। .

कुं  विजेन्द्र शेखावत 
सिंहासन 



एक व्यक्ति आफिस में देर रात तक काम करने के बाद थका -हारा घर पहुंचा . दरवाजा खोलते ही उसने देखा कि उसका पांच वर्षीय बेटा सोने की बजाये उसका इंतज़ार कर रहा है .अन्दर घुसते ही बेटे ने पूछा —“ पापा , क्या मैं आपसे एक प्रश्न पूछ सकता हूँ ?”
“ हाँ -हाँ पूछो , क्या पूछना है ?” पिता ने कहा .
बेटा - “ पापा , आप एक घंटे में कितना कमा लेते हैं ?”
“ इससे तुम्हारा क्या लेना देना …तुम ऐसे बेकार के सवाल क्यों कर रहे हो ?” पिता ने झुंझलाते हुए उत्तर दिया .
बेटा - “ मैं बस यूँही जानना चाहता हूँ . प्लीज बताइए कि आप एक घंटे में कितना कमाते हैं ?” पिता ने गुस्से से उसकी तरफ देखते हुए कहा , “ 100 रुपये .”
“अच्छा ”, बेटे ने मासूमियत से सर झुकाते हुए कहा -,
“ पापा क्या आप मुझे 50 रूपये उधार दे सकते हैं ?”
इतना सुनते ही वह व्यक्ति आग बबूला हो उठा , “ तो तुम इसीलिए ये फ़ालतू का सवाल कर रहे थे ताकि मुझसे पैसे लेकर तुम कोई बेकार का खिलौना या उटपटांग चीज खरीद सको ….चुप –चाप
अपने कमरे में जाओ और सो जाओ ….सोचो तुम कितने स्वार्थी हो …मैं दिन रात मेहनत करके पैसे कमाता हूँ और तुम उसे बेकार की चीजों में बर्वाद करना चाहते हो ”
यह सुन बेटे की आँखों में आंसू आ गए …और वह अपने कमरे में चला गया .
व्यक्ति अभी भी गुस्से में था और सोच रहा था कि आखिर उसके बेटे कि ऐसा करने कि हिम्मत कैसे हुई ……पर एक -आध घंटा बीतने के बाद वह थोडा शांत हुआ , और सोचने लगा कि हो सकता है
कि उसके बेटे ने सच -में किसी ज़रूरी काम के लिए पैसे मांगे हों , क्योंकि आज से पहले उसने कभी इस तरह से पैसे नहीं मांगे थे .फिर वह उठ कर बेटे के कमरे में गया और बोला , “
क्या तुम सो रहे हो ?”, “नहीं ” जवाब आया .
“ मैं सोच रहा था कि शायद मैंने बेकार में ही तुम्हे डांट दिया , दरअसल दिन भर के काम से मैं बहुत थक गया था .” व्यक्ति ने कहा .''सारी'' ….ये लो अपने पचास रूपये .”
ऐसा कहते हुए उसने अपने बेटे के हाथ में पचास की नोट रख दिया .
“थैंक यू पापा ” बेटा ख़ुशी से पैसे लेते हुए कहा , और फिर वह तेजी से उठकर अपनी आलमारी की तरफ गया , वहां से उसने ढेर सारे सिक्के निकाले और धीरे -धीरे उन्हें गिनने लगा .
यह देख व्यक्ति फिर से क्रोधित होने लगा , “ जब तुम्हारे पास पहले से ही पैसे थे तो तुमने मुझसे और पैसे क्यों मांगे ?”
“ क्योंकि मेरे पास पैसे कम थे , पर अब पूरे हैं ” बेटे ने कहा .
“ पापा अब मेरे पास 100 रूपये हैं . क्या मैं आपका एक घंटा खरीद सकता हूँ ? प्लीज आप ये पैसे ले लोजिये और कल घर जल्दी आ जाइये , मैं आपके साथ बैठकर खाना खाना चाहता हूँ .”

दोस्तों , इस तेज रफ़्तार जीवन में हम कई बार खुद को इतना व्यस्त कर लेते हैं कि उन लोगो के लिए ही समय नहीं निकाल पाते जो हमारे जीवन में सबसे ज्यादा महत्व रखते हैं. इसलिए हमें ध्यान
रखना होगा कि इस आपा-धापी में भी हम अपने माँ-बाप, जीवन साथी, बच्चों और अभिन्न मित्रों के लिए समय निकालें, वरना एक दिन हमें भी अहसास होगा कि हमने छोटी-मोटी चीजें पाने के लिए कुछ बहुत बड़ा खो दिया.
 

कुं  विजेन्द्र शेखावत 
सिंहासन