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आजकल विभिन्न मैनेजमेंट साईटें हमे बताती हैं कि नौकरी के लिये इंटरव्यू देते समय क्या-क्या कहना चाहिये, क्या नहीं कहना चाहिये, क्या बताना चाहिये, क्या छुपाना चाहिये आदि-आदि । इसलिये इंटरव्यू के समय प्रत्याशी रेडीमेड और रटे-रटाये, ऊँचे-ऊँचे उत्तर देते हैं, लेकिन असल में उनके मन में क्या होता है, यह पढिये -
हालांकि प्रश्न भी लगभग वही होते हैं सभी कम्पनियों में...लेकिन जो उत्तर हैं वे असल में दिल की आवाज हैं ।

प्रश्न - आपने इस नौकरी के लिये क्यों आवेदन किया ?
उत्तर - बस यूँ ही बहुत सारी जगह आवेदन दिया था, आपने बुला लिया तो चला आया ।
प्रश्न - आप इस कम्पनी के लिये क्यों काम करना चाहते हैं ?
उत्तर - जो कम्पनी मुझे नौकरी दे मुझे वहाँ करना ही है, लेकिन खासतौर से आपकी कम्पनी का नाम मेरे दिमाग में नहीं है..
प्रश्न - हम आपको नौकरी क्यों दें ?
उत्तर - किसी ना किसी को तो आपको रखना ही है, मुझे ही ट्राय करें..
प्रश्न - यदि यह नौकरी मिल जाती है तो आप क्या करेंगे ?
उत्तर - यह तो मेरे मूड और तात्कालिक परिस्थिति पर निर्भर करेगा..
प्रश्न - आपकी प्रमुख शक्ति या मजबूती क्या है ?
उत्तर - अच्छी तनख्वाह देने वाली किसी भी कम्पनी में नौकरी करना, मेरे या कम्पनी के भविष्य की परवाह किये बिना..
प्रश्न - आपकी सबसे बडी कमजोरी क्या है ?
उत्तर - लड़कियाँ (आपकी कम्पनी में भी अच्छी-अच्छी लडकियाँ हैं)
प्रश्न - आपकी सबसे बडी गलती क्या थी, और उससे आपने क्या सीखा ?
उत्तर - पहले वाली कम्पनी में नौकरी करना और सीख मिली कि अधिक तनख्वाह होना चाहिये, इसीलिये मैं आज यहाँ हूँ..
प्रश्न - आप पिछली नौकरी क्यों छोड रहे हैं ?
उत्तर - सीधी सी बात है, सैलेरी बढाने के लिये..
प्रश्न - इस नौकरी से आपकी क्या अपेक्षायें हैं ?
उत्तर - काम ना दिया जाये और हर साल सैलेरी प्रमोशन दिया जाये..
प्रश्न - इस नौकरी का प्रमुख उद्देश्य क्या है और आपकी भविष्य की क्या योजनायें हैं ?
उत्तर - अधिक से अधिक पैसा प्राप्त करना, और उसके लिये प्रत्येक दो-चार वर्षों में कम्पनी बदलते रहना..
प्रश्न - आप की तनख्वाह की क्या अपेक्षायें हैं, और आप उसे कैसे उचित ठहरायेंगे ?
उत्तर - कोई भी व्यक्ति तब तक मौजूदा कम्पनी नहीं छोडता जब तक कि उसे बीस प्रतिशत अधिक तनख्वाह दूसरी कम्पनी में ना मिले (यह एक अलिखित नियम है) इसलिये मुझे बीस प्रतिशत अधिक तनख्वाह चाहिये (और मुझे मालूम है कि आप "बारगेनिंग" करेंगे, इसलिये मैंने पिछली तनख्वाह भी बीस प्रतिशत बढाकर बताई है...)
धन्यवाद, आप जा सकते हैं...


चाणक्य और विदेशी बहू प्रसंग - 

आज से करीब 2300 साल पहले पहले पैदा हुए चाणक्य भारतीय राजनीति और अर्थशास्त्र के पहले विचारक माने जाते हैं। पाटलिपुत्र (पटना) के शक्तिशाली नंद वंश को उखाड़ फेंकने और अपने शिष्य चंदगुप्त मौर्य को बतौर राजा स्थापित करने में 
चाणक्य का अहम योगदान... रहा। ज्ञान के केंद्र तक्षशिला विश्वविद्यालय में 
आचार्य रहे चाणक्य राजनीति के चतुर खिलाड़ी थे और इसी कारण उनकी नीति कोरे 
आदर्शवाद पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक ज्ञान पर टिकी है। आप एक प्रसंग पढे 

सम्राट चंद्रगुप्त अपने मंत्रियों के साथ एक विशेष मंत्रणा में व्यस्त थे कि प्रहरी ने सूचित किया कि आचार्य चाणक्य राजभवन में पधार रहे हैं । सम्राट चकित रह गए । इस असमय में गुरू का आगमन ! वह घबरा भी गए । अभी वह कुछ सोचते ही कि लंबे - लंबे डग भरते चाणक्य ने सभा में प्रवेश किया ।

सम्राट चंद्रगुप्त सहित सभी सभासद सम्मान में उठ गए । सम्राट ने गुरूदेव को सिंहासन पर आसीन होने को कहा । आचार्य चाणक्य बोले - " भावुक न बनो सम्राट , अभी तुम्हारे समक्ष तुम्हारा गुरू नहीं , तुम्हारे राज्य का एक याचक खड़ा है , मुझे कुछ याचना करनी है । " चंद्रगुप्त की आँखें डबडबा आईं । बोले - " आप आज्ञा दें , समस्त राजपाट आपके चरणों में डाल दूं । " चाणक्य ने कहा - " मैंने आपसे कहा भावना में न बहें , मेरी याचना सुनें । " गुरूदेव की मुखमुद्रा देख सम्राट चंद्रगुप्त गंभीर हो गए । बोले - " आज्ञा दें । " चाणक्य ने कहा - " आज्ञा नहीं , याचना है कि मैं किसी निकटस्थ सघन वन में साधना करना चाहता हूं । दो माह के लिए राजकार्य से मुक्त कर दें और यह स्मरण रहे वन में अनावश्यक मुझसे कोई मिलने न आए । आप भी नहीं । मेरा उचित प्रबंध करा दें । " 

चंद्रगुप्त ने कहा - " सब कुछ स्वीकार है । " दूसरे दिन प्रबंध कर दिया गया । चाणक्य वन चले गए । अभी उन्हें वन गए एक सप्ताह भी न बीता था कि यूनान से सेल्युकस ( सिकन्दर का सेनापति ) अपने जामाता चंद्रगुप्त से मिलने भारत पधारे । उनकी पुत्री का हेलेन का विवाह चंद्रगुप्त से हुआ था । दो - चार दिन के बाद उन्होंने चाणक्य से मिलने की इच्छा प्रकट कर दी । सेल्युकस ने कहा - " सम्राट , आप वन में अपने गुप्तचर भेज दें । उन्हें मेरे बारे में कहें । वह मेरा बड़ा आदर करते है । वह कभी इन्कार नहीं करेंगे । " 

अपने श्वसुर की बात मान चंद्रगुप्त ने ऐसा ही किया । गुप्तचर भेज दिए गए । चाणक्य ने उत्तर दिया - " ससम्मान सेल्युकस वन लाए जाएं , मुझे उनसे मिल कर प्रसन्नता होगी । " सेना के संरक्षण में सेल्युकस वन पहुंचे । औपचारिक अभिवादन के बाद चाणक्य ने पूछा - " मार्ग में कोई कष्ट तो नहीं हुआ । " इस पर सेल्युकस ने कहा - " भला आपके रहते मुझे कष्ट होगा ? आपने मेरा बहुत ख्याल रखा । " न जाने इस उत्तर का चाणक्य पर क्या प्रभाव पड़ा कि वह बोल उठे - " हां , सचमुच आपका मैंने बहुत ख्याल रखा । " इतना कहने के बाद चाणक्य ने सेल्युकस के भारत की भूमि पर कदम रखने के बाद से वन आने तक की सारी घटनाएं सुना दीं । उसे इतना तक बताया कि सेल्युकस ने सम्राट से क्या बात की , एकांत में अपनी पुत्री से क्या बातें हुईं । मार्ग में किस सैनिक से क्या पूछा । सेल्युकस व्यथित हो गए । बोले - " इतना अविश्वास ? मेरी गुप्तचरी की गई । मेरा इतना अपमान । "

चाणक्य ने कहा - " न तो अपमान , न अविश्वास और न ही गुप्तचरी । अपमान की तो बात मैं सोच भी नहीं सकता । सम्राट भी इन दो महीनों में शायद न मिल पाते । आप हमारे अतिथि हैं । रह गई बात सूचनाओं की तो वह मेरा " राष्ट्रधर्म " है । आप कुछ भी हों , पर विदेशी हैं । अपनी मातृभूमि से आपकी जितनी प्रतिबद्धता है , वह इस राष्ट्र से नहीं हो सकती । यह स्वाभाविक भी है । मैं तो सम्राज्ञी की भी प्रत्येक गतिविधि पर दृष्टि रखता हूं । मेरे इस ' धर्म ' को अन्यथा न लें । मेरी भावना समझें । " 

सेल्युकस हैरान हो गया । वह चाणक्य के पैरों में गिर पड़ा । उसने कहा - " जिस राष्ट्र में आप जैसे राष्ट्रभक्त हों , उस देश की ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देख सकता । " सेल्युकस वापस लौट गया ।

मित्रों आज भारत में फिर से एक विदेशी बहु का राज चल रहा है , तो क्या हम भारतीय राष्ट्रधर्म का पालन कर रहे है ???


जीवन में ढलती खुशियों की शाम है बीवी
जो पढ़ी नहीं सिर्फ सुनी जाये वो कलाम है बीवी

सर चढ़ गयी तो फिर कुछ भी अपने बस में नहीं
ये जान के भी जो पी जाये वो जाम है बीवी

क्यों मारी पैर पे कुल्हाड़ी जेहन में उनके है अब
जो सोचते थे चक्कर काटने का इनाम है बीवी

अरेंज मर्डर हुआ हो या इश्क में खुद ही चढ़ गए सूली
जो सब को झेलनी, ऐसी उलझनों आम है बीवी

सजा तय है जो जुर्म किया हो न किया हो
रोयी नहीं की फिर क्या सबूत क्या इलज़ाम है बीवी

माँ की कहानियों में ही होती थी सावित्री, दमयंती
मगर अब शहरी चका-चौंध की गुलाम है बीवी

क्या करो, ओढो, पहनो ये बताने की जुर्रत किसको
पर क्या ये खर्चे मेरे पसीने का दाम है बीवी

माँ-बाप पीछे पड़े हैं कैसे समझाऊ उन्हें
बदलते दौर में किस बला का नाम है बीवी

कुंवारा हूँ सो कह लूं आज जो कुछ भी कहना है
कल तो लिखना ही है खुदा का पैगाम है बीवी





भगवान् का शुक्र है अभी तक कुंवारा हूँ .


दिल में दर्द दबाने की
आँखों में नमी छुपाने की
हर कोशिश कर के हार गए
हम तेरी याद भूलाने की

तेरी चाहत में हमने
हर दर्द को समझा थोड़ा था
उस रोज बिखर गए टूट के हम
जब तुमने भी भी मुंह मोडा था
रोते रहे थे रात भर
बाकी फिर भी समंदर था
जाने कितना दर्द अभी भी
इस सीने के अंदर था

फिर आदत हो गयी दिल को
वक़्त गम के साथ बिताने की
हर कोशिश कर के हार गए
हम तेरी याद भूलाने की

कु. विजेंद्र शेखावत
ठि. सिंहासन


यौवन के मद में अनियंत्रित, सागर में खो जाने को
आज चला था पैसो से मैं यौवन का सुख पाने को

दिल की धड़कन भी थिरक रही थी यौवन के मोहक बाजे पे
अरमानों के साथ मैं पंहुचा उस तड़ीता के दरवाजे पे

अंदर पंहुचा तो मानो हया ने भी मुँह फेर लिया
चारो तरफ से मुझको यूँ रुपसियों ने था घेर लिया

हर कोई अपने यौवन के श्रृंगार से सुसज्जित था
पर अब जाने क्यों मेरा मॅन थोडा सा लज्जित था

आहत होता था हृदय बहुत उन संबोधन के तीरों से
पर अभी भी मॅन था बंधा हुआ संवेगों की जंजीरों से

तभी एक रूपसी पर अटकी मेरी दृष्टि थी
लगता था मानो स्वयं वही सुन्दरता की सृष्टि थी

व्यग्र हुआ मॅन साथ में उसके स्वयं चरम सुख पाने को
उस कनकलता को लिए चला अपनी कामाग्नि बुझाने को

जून के उष्ण महीने में बसंती सी हो गयी थी रुत
कुछ ऐसे अपने तन को उसने मेरे समुख किया प्रस्तुत

खुला निमंत्रण था सपनो को आलिंगन में भरने का
पर नहीं समझ पा रहा था कारण अपने अंतस के डरने का

अंतस को अनदेखा कर के प्रथम स्पर्श किया तन को
उस मद से ज्यादा मद-मादित अब तक कुछ नहीं लगा मॅन को

खुद अंग ही इतने सुंदर थे लज्जा आ जाये गहनों को
पर सहसा सहम गया देख उस मृग-नयनी के नयनो को

आँखों में कोई चमक नहीं चेहरे पे कोई भाव नहीं
सपने कोई छीन गया जैसे जीने कोई चाह नहीं

प्रश्नों की श्रृंखल कड़ियों ने सारा मद तोड़ दिया पल में
व्याकुल था अंतस जानने को क्या है इसके हृदयातल में

उसे देख अवस्था में ऐसी जब रहा नहीं गया मुझसे
जो उबल रहा था अंतस में वो सब कुछ बोल दिया उससे

आँखे सूना चेहरा सूना क्यों सूना तेरा जीवन है
इच्छाओं के संसार में क्यों अब लगता नहीं तेरा मॅन है

सिर्फ तन का मूल्य दिया हूँ मैं, मॅन पर मेरा अधिकार नहीं
पर इतना तो बता ऐ कनकलता क्या तुझको मैं स्वीकार्य नहीं

हे कामप्रिया!,हे मृगनयनी! ऐसी क्या विवशता है तुझको
जो मॅन से मेरे साथ नहीं फिर तन क्यों सौप दिया मुझको

शांत भाव से बोली वो यहाँ मॅन को कौन समझता है
एक लड़की के लिए गरीबी ही उसकी सबसे बड़ी विवशता है

इतना कह के फिर शांत हो गयी कुछ समझ नहीं आया मुझको
प्रश्नों की श्रृंखल कड़ियों से फिर मैंने झक-झोर दिया उसको

लड़ना ही जीवन है चाहे मुश्किल कितनी भी ज्यादा हो
फिर नारी हो के क्यों तोड़ दिया तुमने अपनी मर्यादा को

कमी नहीं दुनिया में काम की पैसे इज्जत से कमाने को
फिर क्यों बेच दिया खुद को बस अपनी क्षुधा मिटाने को ?

तड़प उठी वो मेरे ऐसे प्रश्नों के आघातों से
मुझसे बोली क्या समझाना चाहते हो इन बातों से

शौक नहीं था वेश्या बन बाज़ारों में बिक जाने का
अपने ही हाथों से खुद अपना आस्तित्व मिटाने का

पर आँखों के सारे सपने एक रोज बह गए पानी में
जब माँ-बाप,घर-आँगन सब खो गए सुनामी में

फिर एक ही रात में बदल गयी मेरी दुनिया की तस्वीर यहाँ
कठपुतली बना के बहुत नचाई मुझको मेरी तक़दीर यहाँ

दिन अच्छे हो जाते हैं राते भी अच्छी लगती हैं
भरे पेट को सिद्धांत की हर बातें अच्छी लगती हैं

पर मई-जून की गर्मी से जब देह झुलसने लगती है
रोटी के टुकड़े खोज रही आँखे कुछ थकने लगती हैं

भूख की आग में तड़प-तड़प मुश्किल से दिन कट पाते हैं
अपनी बेबसी में घुट-घुट कर सपनों को जलाती रातें है

जब नीली छत के सिवा सर पर कोई और छत नहीं होती है
कपडो के छेदों से झाँक रही मजबूरी खुद पे रोती है

गिद्धदृष्टि से देहांश देखता जब कोई चीर-सुराखों से
तब मॅन छलनी हो जाता है तीर विष बुझे लाखों से

जब इन हालातों से लड़ लड़ कर जवानी थकने लगती है
तब मर्यादा और सम्मान की ये बातें बेमानी लगने लगतीं है

लोगो ने जाने कितनी बार मन को निर्वस्त्र कर डाला था
पर फिर भी किसी तरह मैंने अपना तन संभाला था

पर एक दिन कुचल गयी कली कुछ मदमाते क़दमों से
कुछ और नहीं अब बाकी था इन किस्मत के पन्नों में

खुद को ख़त्म कर लेने का निश्चय कर लिया मेरे मॅन ने
पर लाख चाहने पर भी दिल का साथ नहीं दिया हिम्मत ने

पर जीने का मतलब मेरे लिए हर मोड़ पर एक समझौता था
फिर इस जगह से ज्यादा गया गुजरा मेरे लिए क्या हो सकता था

इतना गिर गयी हूँ मैं कैसे ये सवाल हमेशा डसता था
लेकिन मेरे पास भी इसके सिवा अब और कहाँ कोई रस्ता था

उस वक़्त बहुत मैं रोई थी हद से ज्यादा चिल्लाई थी
दूसरों के हाथ आस्तित्वहीन हा जब खुद को मैं पाई थी

पर रो-रो के सारे आंसू एक रोज़ बहा डाला मैंने
हर अरमान का गला घोंट कफ़न ओढा डाला मैंने

पर अब पेट भर जाने पर भी जब नीद नहीं आती रातों को
नहीं सँभाल पता है ये दिल तब इन बिखरे जज्बातों को

क्यों नहीं सजा सकती हूँ मैं दुल्हन बन किसी आँगन को
क्यों प्रेयसी बनने का अधिकार नहीं मिला मुझ अभागन को

काश कि मैं भी किसी को प्राणों से प्यारा कह पाती
काश कि मैं भी किसी के हृदयातल में रह पाती

काश कि मेरे आँचल में भी एक अंश मेरा अपना होता
ममता से पागल हो जाती एक बार जो मुझको माँ कहता

इतना कहते कहते ही उसकी आँखे भर आई थी
मैं भी था खामोश वहाँ बस एक उदासी छाई थी

फिर मुझमे हिम्मत ही नहीं थी उससे कुछ कह पाने को
धीमे क़दमों से लौट गया वापस गंतव्य पे जाने को

सोचता रहा ये रास्ते भर होके मानववृत्ति के अधीन
वो चरित्रहीन थी या फिर दुनिया ही है चरित्रहीन



सभी मित्रों से निवेदन है कृपया इसे असभ्य न समझे ये आज के समाज के इंसान की असलियत है  

कु. विजेंद्र शेखावत
ठि. सिंहासन


(अपने बी. काम. फर्स्ट इयर में जब मैंने ये कविता लिखी थी उस वक़्त unicode जैसी सहूलियत नहीं थी इसलिए मेरे दोस्त भगवान सिंह , जो की इस कविता के प्रेरणा भी थे (क्युकी वो कभी कभी बोलता की यार मैं इमरान हाश्मी बनना चाहता हूँ ) ने इसे हिंदी पैड पे लिख के jpeg फॉर्मेट में मेल में attach किया! आज मैं इसे unicode में यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ )

मैं इमरान हाशमी बनना चाहता हूँ

पांचवी कक्षा की एक क्लास मे मास्टर ने बच्चों से पूछा
बताओ क्या बनोगे, कैसे करोंगे अपने माँ-बाप का नाम ऊँचा
किसी ने IAS. किसी ने PCS. किसी ने कहा अच्छा आदमी बनाना चाहता हूँ
तभी पीछे की सीट से उठकर एक बच्चे ने कहा
Sir! मैं इमरान हाशमी बनना चाहता हूँ

ऐसे जवाब की ख्वाब मे भी नही की थी कभी कल्पना
पर Teacher को लगा शायद हो ये लडके का बचपना
समझाया की बेटा गलती की है तुने Career को चुनने मे
ये तो बता क्या प्रॉब्लम है तुझे और कुछ बनने मे ???

लड़का बोला Sir! जॉब मे अभी कहाँ इतना पैसा है
और Business करना मुझे लगता बेवकूफों जैसा है
नेता फस जाते हैं Akshar स्टिंग ऑपरेशन के जंजाल मे
खेल मे Zahar भर दिया मैच फिक्सिंग के बवाल ने
पर फ़िल्म इंडस्ट्री मे प्रोफिट की लाइन हमेशा ऊपर चढ़ती है
बढ़िया काम से Price-Value तो बुरे से Popularity बढ़ती है
और इस बात को तो ख़ुद कई बड़े फ़िल्म समीक्षक माने है
MMS Clips से भी ज्यादा बिकते इमरान के फिल्मो के गाने है

मै भी ऐसे गाने कर अपनी लाइफ बदलना चाहता हूँ
इसीलिए तो Sir! मैं इमरान हाशमी बनाना चाहता हूँ

हुंह!!!! आज कल के लडके जाने पढ़ते हैं किस किताब से
Teacher का भी सर चक्र गया बच्चे के इस जवाब से
Teacher ने फ़िर भी पूछा उसमे ऐसी क्या बात समाई है
ये तो बता अभिषेक बच्चन बनने मे क्या बुराई है ???

सिर्फ़ दो फिल्मो से इतना नाम नही कमाया अभिषेक के बाप ने
Murder किया लड़किया फ़िर भी कहती .Aashiq Banaya Aap Ne…
मल्लिका,तनुश्री, उदिता निपटी पिछली फिल्मों की साइन मे
सुनाने मे आया है की अब सेलिना हृषिता भी है लाइन मे

मै भी ऐसे टेस्टी CHOCOLATE का स्वाद चखाना चाहता हूँ
इसीलिए तो Sir मैं इमरान हाशमी बनाना चाहता हूँ

अब मास्टर का गुस्सा पहुच गया सातवे आसमान पे
बोले.. सिवाय लड़किया घुमाने के क्या किया इमरान ने ??
Sir! लड़कियों को पीछे घुमाना कोई आसान काम नही
वरना बड़े Powerful लोगो का होता ये अंजाम नहीं

क्या नही जानते आप America के पूर्व राष्ट्रपति को ??
कैसे प्राप्त हुए मोनिका के चक्कर मे .वीरगति को
बदल गया कप्तान देश का सौरभ-नग्मा के टक्कर मे
Cricket खेलना भूल गया वो .नए खेल के चक्कर मे
मेरी इतनी बातों का मतलब बिलकुल सीधा-साफ है
काबिलियेत मे भी इमरान हाशमी. बिल क्लिंटन का बाप है

मैं भी एक Demanded और काबिल आदमी बनाना चाहता हूँ
इसीलिए तो Sir! मैं इमरान हाशमी बनाना चाहता हूँ


कु. विजेंद्र शेखावत
ठि. सिंहासन


जमाने के सितम ने कर दिया बहुत बुरा हाल है,
इंजीनियरिंग कॉलेज में जूली का ये चौथा साल है,

यूँ तो क्लास में टीचर एंट्री देते नहीं इसे,
पर २-३ क्लास करके जूली ने मचाया काफी बवाल है,

कहाँ साल भर प्रिप्रेशन करने के बाद लड़के एडमिशन लेने आते हैं,
और फिर रहने के लिए हॉस्टल का एक ट्रीपल सीटर रूम पाते हैं,

पर जूली तो बचपन से ही हॉस्टल में अपनी मनमानी चलायी है,
किसी ट्रिपल सीटर में दिन तो सिंगल सीटर में रातें बिताई है,

वार्डेन महीनों में कभी चेक करे ये बड़ी बात हैं,
पर जूली कमरों में झांकती हर रात हैं,

दरवाजा बंद है तो अगले पे जाती है,
गर खुला मिल जाये तो बिस्तर पे आराम फरमाती है,

इतना ही नहीं जूली ने और भी कई गुल खिलाये हैं,
चंगु-मंगू नाम के दो बच्चे अपने गुलशन में उगाये हैं,

पर आजकल जूली घूमती तन्हा अकेली है,
उसके बच्चो का पिता कौन है ये अबुझ पहेली है,

हमारे पड़ोस वाले गुप्ता जी नशे में मस्त रहते हैं,
इनकी बक-बक से पूरे हॉस्टलवासी त्रस्त रहते हैं,

उस रात जूली उनके कमरे में सोई थी,
अपने टाइगर के खयालो में जाने कहाँ खोई थी,

इतने में गुप्ता जी नशे में अन्दर आये,
और जूली की बाहों में बिस्तर पर रात बिताये,

सुबह जब आँखे खुली तो गलती का एहसास था,
तन्हाई के सिवा अब कुछ नहीं जूली के पास था,

तब से वो पतला कुत्ता टाइगर भी साथ नहीं रहता है,
वो भी ज़माने की तरह जूली को बेवफा कहता है,

“अरे माफ़ कीजीयेगा…. जूली का परिचय देना तो भूल गया”

यूँ तो AKGEC के ब्वायेस हॉस्टल में इसे किसी परिचय की जरुरत नहीं,
पर जूली नाम की ये आवारा कुतिया जरा भी खूबसूरत नहीं ,

पर जूली का हॉस्टल से प्यार देखते हे बनता है,
साल में कई मौको पे इसका का बैर्थ-डे मानता है,

दर-असल जब भी जूली किसी का बर्थ-डे के खा जाती है ,
तो बर्थडे बॉय की बर्थडे बमप्स में लातें भी पाती है,

अरे एक बार तो मेरे आँखों के सामने हे पूरा हंगामा खडा था,
गलती से जूली छत पे बंद क्या हुई सारा होस्टल ताले पे जुटा पड़ा था,

थोडी देर में ताला टुटा तो लोगो की जान में जान आई ,
ये बात और है की थोडी हे देर में जूली फिर कई लातें खाई ,

जूली नाक में दम कर देती है अच्छे-अच्छो की,
कहानी पे यकीं कर लो कसम तुम्हे जुली के बच्चो की ,



कुं विजेंद्र शेखावत
सिंहासन